
नकली दवाओं के खिलाफ जंग: सेवानिवृत्त नियामकों ने सुझाए सख्त कदम
भारत में नकली दवाओं का व्यापार तेजी से बढ़ रहा है, जो स्वास्थ्य प्रणाली के लिए गंभीर खतरा बन चुका है। देश के कई सेवानिवृत्त दवा नियामकों ने इस समस्या पर चिंता जताते हुए इसे रोकने के लिए विशेष रणनीतियां अपनाने की सिफारिश की है। उनका मानना है कि राज्य दवा नियंत्रण प्रशासन को अंतरराज्यीय संचार और कड़े कानूनों के जरिए इस खतरे से निपटना होगा।
नकली दवाओं की समस्या और इसकी जड़ें
हाल ही में बंगाल केमिस्ट एंड ड्रगिस्ट एसोसिएशन (BCDA) ने पश्चिम बंगाल सरकार को सतर्क किया कि राज्य में बेची जा रही दवाओं का एक बड़ा हिस्सा नकली है। एसोसिएशन ने सरकार से पड़ोसी राज्यों से आने वाली दवाओं की जांच करने की अपील की है। इस चेतावनी के बाद प्रशासन ने निरीक्षण तेज कर दिए हैं और कई मामले दर्ज किए गए हैं।
सेवानिवृत्त दवा नियामकों के अनुसार, नकली दवाओं के बढ़ते जाल के पीछे कई कारण हैं। राज्य दवा नियंत्रण विभाग के पास संसाधनों की कमी है, जिससे बाजार पर पूरी तरह नियंत्रण रखना कठिन हो गया है। इसके अलावा, दवा निर्माण और विपणन के बीच समन्वय की कमी भी इस समस्या को बढ़ा रही है।
छोटी कंपनियों की बड़ी भूमिका
ज्यादातर नकली दवाएं ऐसी छोटी कंपनियों द्वारा बनाई जाती हैं, जो लोकप्रिय ब्रांड्स के नाम से उत्पाद तैयार करती हैं। इन कंपनियों को अक्सर बड़ी मार्केटिंग कंपनियां काम देती हैं, जो अपने थोक लाइसेंस के तहत इन दवाओं को बाजार में उतारती हैं।
त्रिपुरा के पूर्व औषधि नियंत्रक डॉ. नारायण गोस्वामी का मानना है कि इन नकली दवाओं के प्रसार में मुख्य दोषी मार्केटिंग कंपनियां हैं। उन्होंने सुझाव दिया कि अगर दवा के लेबल पर निर्माता कंपनी का पता और लाइसेंस नंबर स्पष्ट रूप से दिया जाए, तो नकली दवाओं पर काफी हद तक अंकुश लगाया जा सकता है।
नियामकों के सुझाव: समाधान की राह
- सख्त कानून और नियमन:
- हर राज्य में दवा अधिनियम (Drug Act) के प्रावधानों को सख्ती से लागू किया जाए।
- मार्केटिंग कंपनियों पर निगरानी बढ़ाई जाए और उन्हें नियम 84 (D) और 84 (E) के तहत उत्पाद की गुणवत्ता बनाए रखने के लिए जवाबदेह ठहराया जाए (नरेंद्र कुमार आहूजा, पूर्व डीसी, हरियाणा)।
- निर्माण स्तर पर जांच:
- दवाओं की गुणवत्ता जांच मैन्युफैक्चरिंग स्तर से शुरू होनी चाहिए।
- नकली दवा पाए जाने पर, असली निर्माता की मदद से नकली उत्पाद बनाने वाली कंपनी तक पहुंचने की कोशिश की जाए।
- ट्रैकिंग सिस्टम:
- सप्लाई चेन में दवाओं की आवाजाही पर नजर रखने के लिए ट्रैक एंड ट्रेस सिस्टम लागू किया जाए (डॉ. प्रदीप मट्टू, पूर्व ड्रग कंट्रोलर, पंजाब)।
- राज्य दवा नियामक निकायों के बीच सूचना साझा करने की व्यवस्था बनाई जाए, ताकि नकली उत्पादों की पहचान तेजी से हो सके।
- लेबलिंग में पारदर्शिता:
- हर दवा के लेबल पर निर्माता और मार्केटिंग कंपनियों के पते और लाइसेंस नंबर स्पष्ट रूप से दिए जाएं।
- क्यूआर कोड या बारकोड जैसी तकनीक अपनाई जाए, जिससे मरीज दवा की प्रामाणिकता की जांच खुद कर सकें (डॉ. रेवी एस मेनन, पूर्व औषधि नियंत्रक, केरल)।
- प्रिंटिंग पर नियंत्रण:
- दवा के लेबल प्रिंट करने वाले प्रिंटर को भी नियमन के दायरे में लाया जाए, ताकि फर्जी लेबलिंग पर रोक लग सके।
निष्कर्ष:
सेवानिवृत्त अधिकारियों का मानना है कि नकली दवाओं के खतरे से निपटने के लिए बहुआयामी रणनीति की जरूरत है। मजबूत कानून, आधुनिक ट्रैकिंग सिस्टम, अंतरराज्यीय सहयोग और जनता में जागरूकता के जरिए ही इस समस्या पर काबू पाया जा सकता है।
दवा अधिनियम का कड़ाई से पालन और मार्केटिंग कंपनियों की जवाबदेही तय करना इस लड़ाई में अहम हथियार साबित हो सकते हैं। अब देखना यह है कि सरकार और प्रशासन इन सुझावों को लागू करने के लिए कितनी गंभीरता दिखाते हैं।