CDSCO ने राज्यों को जारी किया सख्त निर्देश, क्लोरैमफेनिकॉल और नाइट्रोफ्यूरान दवाओं पर तत्काल रोक के प्रभावी पालन का आदेश
नई दिल्ली, 9 जून 2026। देश से होने वाले समुद्री खाद्य (Seafood) निर्यात पर बढ़ते खतरे और अंतरराष्ट्रीय बाजारों में भारतीय उत्पादों की साख बचाने के लिए केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन (CDSCO) ने सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के ड्रग कंट्रोलरों को सख्त निर्देश जारी किए हैं। ड्रग्स कंट्रोलर जनरल ऑफ इंडिया (DCGI) डॉ. राजीव सिंह रघुवंशी ने एक पत्र जारी कर खाद्य उत्पादन करने वाले पशुओं और जलीय जीवों के पालन-पोषण में Chloramphenicol और Nitrofurans युक्त दवा फॉर्मूलेशनों के आयात, निर्माण, बिक्री, वितरण और उपयोग पर तत्काल प्रभाव से प्रतिबंध के कड़ाई से पालन को सुनिश्चित करने को कहा है।
निर्यात खेपों में लगातार मिल रहे अवशेष
CDSCO के अनुसार, समुद्री उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण (MPEDA) ने 27 जनवरी 2026 को भेजे गए पत्र में गंभीर चिंता व्यक्त की है कि मार्च 2025 में जारी प्रतिबंध अधिसूचना (S.O. 1158 दिनांक 12.03.2025) के बावजूद झींगा (Shrimp) निर्यात खेपों में Chloramphenicol और Nitrofurans के अवशेष लगातार पाए जा रहे हैं।
MPEDA के मुताबिक वर्ष 2025 में यूरोपीय संघ (EU), अमेरिका (USA) और जापान द्वारा भारतीय झींगा निर्यात खेपों की लगभग 43 प्रतिशत अस्वीकृतियों (Rejections) का कारण इन्हीं प्रतिबंधित दवाओं के अवशेष रहे। यह मामला 40 से अधिक एक्वाकल्चर फार्मों से जुड़ा पाया गया है।
किन राज्यों में सबसे अधिक मामले
रिपोर्ट के अनुसार प्रभावित फार्म मुख्य रूप से निम्न राज्यों में पाए गए हैं—
- आंध्र प्रदेश – 74%
- ओडिशा – 13%
- पश्चिम बंगाल – 8.7%
- गुजरात – 4.3%
इन आंकड़ों ने नियामक एजेंसियों की चिंता बढ़ा दी है क्योंकि भारत विश्व के प्रमुख झींगा निर्यातकों में शामिल है।
राज्यों से मांगी गई विस्तृत रिपोर्ट
DCGI ने सभी राज्य औषधि नियंत्रकों से तीन प्रमुख बिंदुओं पर विस्तृत जानकारी मांगी है—
- प्रतिबंध अधिसूचना के क्रियान्वयन की वर्तमान व्यवस्था।
- पशु चिकित्सा दवा दुकानों और संबंधित प्रतिष्ठानों में किए गए निरीक्षणों की संख्या तथा उनके परिणाम।
- नियम उल्लंघन करने वालों के खिलाफ की गई दंडात्मक कार्रवाई का विवरण।
केंद्र ने स्पष्ट किया है कि राज्यों को समयबद्ध तरीके से यह जानकारी उपलब्ध करानी होगी ताकि आगे की नियामक कार्रवाई की जा सके।
मेडिकल दुकानों और निर्माताओं पर भी निगरानी
पत्र में यह भी कहा गया है कि Chloramphenicol और Nitrofurans युक्त दवाओं की बिक्री केवल अधिकृत एवं लाइसेंसधारी निर्माताओं तक ही सीमित रहे। इनके उत्पादन, वितरण और उपयोग का उचित रिकॉर्ड तथा मिलान (Reconciliation) सुनिश्चित किया जाए।
यदि किसी स्तर पर इन दवाओं का अवैध उपयोग, बिक्री या वितरण पाया जाता है तो संबंधित पक्षों के विरुद्ध Drugs and Cosmetics Act, 1940 तथा Drugs Rules, 1945 के तहत कार्रवाई की जाए।
खाद्य सुरक्षा और निर्यात दोनों पर असर
विशेषज्ञों का मानना है कि Chloramphenicol और Nitrofurans जैसी दवाओं के अवशेष मानव स्वास्थ्य के लिए गंभीर जोखिम पैदा कर सकते हैं। इसी कारण अमेरिका, यूरोपीय संघ और जापान जैसे देशों ने इनके लिए अत्यंत कठोर मानक निर्धारित किए हैं।
यदि भारतीय निर्यात खेपों में इन दवाओं के अवशेष लगातार मिलते रहे तो इससे न केवल निर्यातकों को आर्थिक नुकसान होगा बल्कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारतीय समुद्री उत्पादों की विश्वसनीयता भी प्रभावित हो सकती है।
सख्त निगरानी का संकेत
CDSCO का यह ताजा निर्देश संकेत देता है कि केंद्र सरकार अब केवल अधिसूचना जारी करने तक सीमित नहीं रहना चाहती, बल्कि राज्यों से वास्तविक प्रवर्तन (Enforcement) और निरीक्षण रिपोर्ट भी मांग रही है। इससे आने वाले समय में पशु चिकित्सा दवा दुकानों, एक्वाकल्चर फार्मों और संबंधित आपूर्ति श्रृंखला पर निगरानी और अधिक सख्त होने की संभावना है।
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि राज्यों द्वारा प्रभावी निरीक्षण और प्रवर्तन किया जाता है तो भारतीय समुद्री उत्पादों के निर्यात पर मंडरा रहा प्रतिबंध और अस्वीकृति का खतरा काफी हद तक कम किया जा सकता है।



