72 करोड़ की ‘नकली दवा’ कार्रवाई पर उठे गंभीर सवाल: 28 में 27 नमूने निकले मानक के अनुरूप, अब 2026 की जांच रिपोर्ट का इंतजार

72 करोड़ की ‘नकली दवा’ कार्रवाई पर उठे गंभीर सवाल: 28 में 27 नमूने निकले मानक के अनुरूप, अब 2026 की जांच रिपोर्ट का इंतजार

आगरा। अगस्त 2025 में आगरा के फव्वारा थोक दवा बाजार में औषधि विभाग और स्पेशल टास्क फोर्स (एसटीएफ) द्वारा की गई करीब 72 करोड़ रुपये की कथित नकली दवाओं की बरामदगी को देश की सबसे बड़ी कार्रवाई में से एक बताया गया था। उस समय दावा किया गया था कि एक बड़े गिरोह का पर्दाफाश हुआ है, जो नामी कंपनियों के नाम पर नकली दवाओं की आपूर्ति उत्तर प्रदेश सहित कई राज्यों में कर रहा था। लेकिन अब केंद्रीय औषधि प्रयोगशाला की जांच रिपोर्ट सामने आने के बाद इस कार्रवाई पर कई गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।

कार्रवाई के दौरान जब्त की गई दवाओं के 28 नमूने केंद्रीय प्रयोगशाला भेजे गए थे। जांच रिपोर्ट में 27 नमूने मानक गुणवत्ता (Standard Quality) के पाए गए, जबकि केवल एक दवा अधोमानक (Substandard) निकली। इस खुलासे के बाद दवा कारोबारियों और विशेषज्ञों के बीच यह बहस तेज हो गई है कि जिस कार्रवाई को बड़े नकली दवा रैकेट का खुलासा बताया गया था, उसके अधिकांश नमूने गुणवत्ता की जांच में सही कैसे पाए गए।

छापेमारी के दौरान कंपनियों ने जताई थी आपत्ति

22 अगस्त 2025 को एसटीएफ और औषधि विभाग ने आगरा के फव्वारा बाजार स्थित कई थोक दवा प्रतिष्ठानों और एक ट्रांसपोर्ट कंपनी पर संयुक्त छापेमारी की थी। कार्रवाई के दौरान कई प्रमुख दवा कंपनियों के अधिकृत प्रतिनिधियों को मौके पर बुलाया गया था।

प्रतिनिधियों ने पैकेजिंग, होलोग्राम, प्रिंटिंग, बैच नंबर, क्यूआर कोड और अन्य सुरक्षा चिन्हों का मिलान करने के बाद कई दवाओं को अपनी कंपनी का असली उत्पाद मानने से इनकार कर दिया था। जांच में यह भी दावा किया गया था कि कुछ दवाओं की सप्लाई संबंधित कंपनियों ने उन फर्मों को कभी की ही नहीं थी, जिनके नाम पर बिल तैयार किए गए थे। इसी आधार पर बड़ी मात्रा में बरामद दवाओं को संदिग्ध और फर्जी बताया गया था।

एक असली पैक से तैयार किए जाते थे सैकड़ों पैकेट

एसटीएफ की जांच में यह दावा भी किया गया था कि गिरोह पहले बाजार से किसी ब्रांड की एक असली दवा खरीदता था। इसके बाद उसी बैच नंबर और क्यूआर कोड की नकल कर सैकड़ों पैकेट तैयार किए जाते थे।

कंपनी प्रतिनिधियों के अनुसार, प्रत्येक असली पैक का क्यूआर कोड अलग होता है, जबकि बरामद कई पैकेटों पर एक ही क्यूआर कोड पाया गया। इसे फर्जीवाड़े का महत्वपूर्ण संकेत माना गया था और इसी आधार पर कार्रवाई को बड़ी सफलता बताया गया था।

फिर लैब रिपोर्ट ने क्यों बदली तस्वीर?

जब जब्त दवाओं के नमूने केंद्रीय प्रयोगशाला पहुंचे तो तस्वीर कुछ अलग सामने आई। जांच में अधिकांश नमूने गुणवत्ता के मानकों पर खरे उतरे और केवल निमोनिया की एक दवा अधोमानक पाई गई।

यहीं से पूरा मामला चर्चा का विषय बन गया। सवाल उठने लगे कि यदि कंपनियों के प्रतिनिधियों ने मौके पर दवाओं को फर्जी बताया था, तो प्रयोगशाला में वही दवाएं मानक गुणवत्ता की कैसे निकलीं?

विशेषज्ञों का कहना है कि इस मामले में दो अलग-अलग पहलुओं को समझना जरूरी है। प्रयोगशाला केवल दवा की रासायनिक गुणवत्ता, शक्ति और निर्धारित मानकों की जांच करती है। जबकि किसी दवा के नकली या स्प्यूरियस होने का निर्धारण केवल रासायनिक परीक्षण से नहीं होता। इसके लिए पैकेजिंग, ट्रेडमार्क, बैच नंबर, क्यूआर कोड, दस्तावेज, सप्लाई चेन और निर्माता की पुष्टि जैसे कई अन्य साक्ष्यों की भी जांच की जाती है। इसलिए लैब रिपोर्ट और फर्जीवाड़े की जांच के निष्कर्ष अलग-अलग हो सकते हैं।

दर्ज हुए नौ मुकदमे, 40 से अधिक आरोपी

इस कार्रवाई के बाद औषधि विभाग और एसटीएफ ने 9 मुकदमे दर्ज किए और 40 से अधिक लोगों को आरोपी बनाया। कई आरोपियों को गिरफ्तार कर जेल भेजा गया, हालांकि बाद में अधिकांश को अदालत से जमानत मिल गई।

अब जब अधिकांश नमूने मानक गुणवत्ता के पाए गए हैं, तो दवा कारोबारियों का कहना है कि पूरे मामले की जांच प्रक्रिया और कार्रवाई के आधार को सार्वजनिक किया जाना चाहिए, ताकि सभी तथ्यों की स्पष्ट जानकारी सामने आ सके।

अब 2026 की रिपोर्ट पर टिकी हैं निगाहें

22 से 24 जून 2026 के बीच औषधि विभाग और एसटीएफ ने एक बार फिर बड़ी कार्रवाई करते हुए 38 मेडिकल फर्मों और गोदामों से लगभग 3.80 करोड़ रुपये की दवाएं जब्त कीं। इनमें सरकारी आपूर्ति की दवाएं, चिकित्सकीय सैंपल, एक्सपायरी दवाएं और अन्य संदिग्ध दवाएं शामिल बताई गई हैं।

इनमें से 90 नमूने जांच के लिए प्रयोगशाला भेजे गए हैं। उनकी रिपोर्ट अभी आनी बाकी है। अब दवा कारोबारियों, नियामक एजेंसियों और आम लोगों की नजर इसी रिपोर्ट पर टिकी है।

यदि इस बार भी अधिकांश नमूने मानक गुणवत्ता के पाए जाते हैं, तो जांच की प्रक्रिया, जब्ती की कार्रवाई और आरोप तय करने के आधार पर नए सवाल खड़े हो सकते हैं। वहीं यदि बड़ी संख्या में दवाएं अधोमानक या स्प्यूरियस पाई जाती हैं, तो यह हालिया कार्रवाई को मजबूत आधार प्रदान करेगी।

फिलहाल इतना तय है कि आगरा की यह कार्रवाई अब केवल दवाओं की बरामदगी तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि जांच की पारदर्शिता, नियामक एजेंसियों की कार्यप्रणाली और नकली दवाओं के खिलाफ अभियान की विश्वसनीयता पर भी महत्वपूर्ण बहस का विषय बन चुकी है।

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