शेड्यूल-M पर फिर बढ़ सकती है मोहलत? MSME दवा उद्योग ने सरकार से मांगी केस-बाय-केस राहत, गुणवत्ता सुधार और कारोबार के बीच संतुलन की चुनौती
भारत के फार्मास्युटिकल सेक्टर में गुणवत्ता सुधार को लेकर केंद्र सरकार द्वारा लागू किए गए संशोधित शेड्यूल-M (Good Manufacturing Practices – GMP) नियमों को लेकर एक बार फिर बहस तेज हो गई है। देशभर के सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम (MSME) दवा निर्माताओं ने केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय से मांग की है कि जिन इकाइयों ने अपने संयंत्रों के आधुनिकीकरण और गुणवत्ता सुधार की प्रक्रिया शुरू कर दी है, उन्हें केस-बाय-केस आधार पर अतिरिक्त समय दिया जाए।
उद्योग का कहना है कि वह संशोधित शेड्यूल-M के उद्देश्य का पूरी तरह समर्थन करता है, लेकिन इसे लागू करने के लिए आवश्यक बुनियादी ढांचे, मशीनरी, वैलिडेशन और गुणवत्ता प्रणालियों को स्थापित करने में अपेक्षा से अधिक समय और निवेश की जरूरत पड़ रही है। ऐसे में यदि सरकार लचीला रुख नहीं अपनाती है तो हजारों MSME दवा इकाइयों पर अस्तित्व का संकट खड़ा हो सकता है।
क्या है संशोधित शेड्यूल-M?
भारत सरकार ने दिसंबर 2023 में शेड्यूल-M के नियमों को संशोधित किया था। इसका उद्देश्य भारतीय दवा निर्माण इकाइयों को वैश्विक GMP मानकों के अनुरूप बनाना और दवाओं की गुणवत्ता को अंतरराष्ट्रीय स्तर तक पहुंचाना है।
इन नियमों के तहत दवा कंपनियों को आधुनिक उत्पादन सुविधाएं, स्वच्छता मानक, प्रदूषण नियंत्रण, वैलिडेटेड मशीनरी, मजबूत क्वालिटी मैनेजमेंट सिस्टम, उत्पाद गुणवत्ता समीक्षा (PQR) और जोखिम आधारित उत्पादन प्रक्रियाएं अपनानी होंगी।
सरकार का मानना है कि इन सुधारों से नकली, घटिया और गुणवत्ता मानकों पर खरा न उतरने वाली दवाओं पर रोक लगेगी तथा भारतीय दवाओं की वैश्विक साख मजबूत होगी।
MSME इकाइयों की चिंता क्या है?
देश में लगभग 10,500 दवा निर्माण इकाइयां हैं, जिनमें से करीब 80 प्रतिशत MSME श्रेणी में आती हैं। इन छोटे और मध्यम उद्योगों का कहना है कि बड़े उद्योगों की तुलना में उनके पास वित्तीय संसाधन सीमित हैं।
कई कंपनियों ने नए नियमों के अनुरूप अपने संयंत्रों के उन्नयन का काम शुरू कर दिया है, लेकिन भवन संशोधन, HVAC सिस्टम, क्लीन रूम, आधुनिक उपकरण, जल शोधन संयंत्र और दस्तावेजीकरण प्रक्रियाओं को पूरा करने में समय लग रहा है।
उद्योग संगठनों का कहना है कि कई MSME इकाइयों ने ईमानदारी से अपग्रेडेशन शुरू किया है, लेकिन निर्धारित समयसीमा के भीतर सभी कार्य पूरे करना व्यावहारिक रूप से संभव नहीं है। इसलिए सरकार को उन इकाइयों को अतिरिक्त समय देना चाहिए जो सुधार की दिशा में काम कर रही हैं।
नियमों की व्याख्या को लेकर भी भ्रम
फार्मा उद्योग विशेषज्ञों का कहना है कि समस्या केवल समयसीमा की नहीं है, बल्कि कुछ प्रावधानों की व्याख्या को लेकर भी भ्रम की स्थिति बनी हुई है।
उद्योग का आरोप है कि कुछ निरीक्षणों में नियमों को अत्यधिक कठोर संरचनात्मक आवश्यकताओं के रूप में देखा जा रहा है, जबकि शेड्यूल-M का मूल उद्देश्य जोखिम आधारित नियंत्रण और वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाना है।
विशेष रूप से कंटैमिनेशन कंट्रोल, पुराने संयंत्रों की संरचना (Legacy Facilities), उत्पादन क्षेत्रों के लेआउट और अन्य परिचालन मानकों को लेकर विभिन्न राज्यों में अलग-अलग व्याख्याएं सामने आ रही हैं। इससे कंपनियों के निवेश निर्णय प्रभावित हो रहे हैं और अनिश्चितता का माहौल बना हुआ है।
IDMA ने भी उठाई मांग
इंडियन ड्रग मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन (IDMA) ने भी सरकार से आग्रह किया है कि संशोधित शेड्यूल-M के महत्वपूर्ण प्रावधानों पर स्पष्ट दिशानिर्देश जारी किए जाएं।
एसोसिएशन का कहना है कि यदि किसी इकाई के पास वैज्ञानिक आधार पर कोई वैकल्पिक व्यवस्था मौजूद है, तो उसे भी स्वीकार किया जाना चाहिए। इससे नियमों का अनुपालन अधिक व्यावहारिक और एकरूप हो सकेगा।
सरकार पहले ही दे चुकी है एक साल की राहत
गौरतलब है कि स्वास्थ्य मंत्रालय पहले ही MSME दवा कंपनियों को एक बड़ी राहत दे चुका है। सरकार ने संशोधित शेड्यूल-M लागू करने की अंतिम तिथि बढ़ाकर 31 दिसंबर 2025 कर दी थी।
यह राहत उन कंपनियों के लिए थी जिनका वार्षिक कारोबार 250 करोड़ रुपये से कम है। हालांकि इस छूट का लाभ लेने के लिए कंपनियों को 11 मई 2025 तक CDSCO के पास अपना अपग्रेडेशन प्लान जमा करना आवश्यक था।
सरकार ने उस समय कहा था कि MSME इकाइयों को आवश्यक वित्तीय व्यवस्था और बुनियादी ढांचे में सुधार के लिए अतिरिक्त समय की जरूरत है। यह फैसला उद्योग संगठनों की मांग पर लिया गया था।
जनवरी 2026 से शुरू हो चुके हैं निरीक्षण
वर्तमान स्थिति में जनवरी 2026 से निरीक्षण प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। ऐसे में जिन इकाइयों का अपग्रेडेशन कार्य अभी अधूरा है, वे सबसे अधिक दबाव में हैं।
उद्योग का मानना है कि यदि बिना किसी अतिरिक्त राहत के कड़ी कार्रवाई की गई तो अनेक छोटी दवा निर्माण इकाइयों का उत्पादन प्रभावित हो सकता है। इसका असर रोजगार, स्थानीय अर्थव्यवस्था और कुछ आवश्यक दवाओं की उपलब्धता पर भी पड़ सकता है।
गुणवत्ता बनाम कारोबार की चुनौती
विशेषज्ञों का मानना है कि सरकार और उद्योग दोनों के सामने सबसे बड़ी चुनौती गुणवत्ता और कारोबार के बीच संतुलन स्थापित करने की है।
एक ओर भारत में लगातार सामने आ रहे NSQ (Not of Standard Quality) और नकली दवाओं के मामलों ने कठोर गुणवत्ता नियंत्रण की आवश्यकता को साबित किया है। दूसरी ओर हजारों MSME इकाइयों को अचानक भारी निवेश के लिए मजबूर करना भी व्यावहारिक नहीं माना जा सकता।
अब निगाहें स्वास्थ्य मंत्रालय और CDSCO के अगले कदम पर टिकी हैं। यदि सरकार उद्योग की मांग स्वीकार करती है तो कुछ MSME इकाइयों को केस-बाय-केस आधार पर अतिरिक्त समय मिल सकता है। वहीं यदि कोई नई राहत नहीं दी जाती, तो बड़ी संख्या में कंपनियों को जल्द से जल्द अपने संयंत्रों को नए मानकों के अनुरूप बनाना होगा।
फिलहाल इतना तय है कि संशोधित शेड्यूल-M भारतीय फार्मा उद्योग के लिए एक निर्णायक मोड़ साबित होने जा रहा है। यह कदम भारतीय दवाओं की गुणवत्ता को वैश्विक स्तर तक पहुंचाने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है, लेकिन इसके सफल क्रियान्वयन के लिए उद्योग और सरकार के बीच बेहतर समन्वय और स्पष्ट दिशा-निर्देशों की आवश्यकता बनी हुई है।



