IPC का बड़ा कदम: दवाओं में जहरीले रसायनों की जांच के लिए राज्यों के ड्रग लैब अधिकारियों को दिया गया विशेष प्रशिक्षण
गाजियाबाद। देश में दवाओं की गुणवत्ता और मरीजों की सुरक्षा को और मजबूत करने के उद्देश्य से भारतीय फार्माकोपिया आयोग (IPC) ने 22-23 जून 2026 को गाजियाबाद स्थित अपने मुख्यालय में एक विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किया। इस कार्यक्रम में छह राज्यों की औषधि परीक्षण प्रयोगशालाओं के अधिकारियों और विश्लेषकों को दवाओं में मौजूद खतरनाक रसायनों एथिलीन ग्लाइकॉल (EG) और डायएथिलीन ग्लाइकॉल (DEG) की पहचान और जांच का व्यावहारिक प्रशिक्षण दिया गया।
कार्यक्रम का उद्घाटन IPC के सचिव-सह-वैज्ञानिक निदेशक डॉ. वी. कलैसेल्वन ने किया, जबकि दिल्ली औषधि नियंत्रण विभाग के उप औषधि नियंत्रक राजीव भार्गव विशिष्ट अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। अधिकारियों ने कहा कि दवाओं की गुणवत्ता, सुरक्षा और प्रभावशीलता सुनिश्चित करने के लिए सरकारी प्रयोगशालाओं की जांच क्षमता को लगातार मजबूत करना आवश्यक है।
छह राज्यों के अधिकारियों ने लिया हिस्सा
दो दिवसीय इस प्रशिक्षण कार्यक्रम में हरियाणा, गोवा, ओडिशा, पश्चिम बंगाल, असम और मेघालय की राज्य औषधि परीक्षण प्रयोगशालाओं के अधिकारियों ने भाग लिया। प्रतिभागियों को गैस क्रोमेटोग्राफी (GC) तकनीक के माध्यम से मौखिक तरल दवाओं यानी सिरप और अन्य लिक्विड फॉर्मूलेशन में EG और DEG की जांच करने की प्रक्रिया सिखाई गई।
प्रशिक्षण के दौरान अधिकारियों को नमूना तैयार करने, उपकरण संचालन, अंशांकन (Calibration), परीक्षण पद्धति लागू करने, क्रोमैटोग्राम पढ़ने और डेटा विश्लेषण का व्यावहारिक अनुभव दिया गया।
क्यों खतरनाक हैं EG और DEG?
विशेषज्ञों के अनुसार एथिलीन ग्लाइकॉल और डायएथिलीन ग्लाइकॉल अत्यंत विषैले रसायन हैं। इनका उपयोग दवाओं में नहीं किया जा सकता, लेकिन कभी-कभी निम्न गुणवत्ता या मिलावटी कच्चे पदार्थों के माध्यम से ये दवाओं में पहुंच जाते हैं।
ये रसायन आमतौर पर ग्लिसरीन, प्रोपिलीन ग्लाइकॉल, सॉर्बिटोल और पॉलीइथिलीन ग्लाइकॉल जैसे सहायक पदार्थों की मिलावट के कारण दवा निर्माण में प्रवेश कर सकते हैं।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार इनकी थोड़ी मात्रा भी मरीजों के लिए बेहद खतरनाक साबित हो सकती है। इससे:
- किडनी फेल होने का खतरा बढ़ जाता है,
- केंद्रीय तंत्रिका तंत्र (Central Nervous System) प्रभावित हो सकता है,
- गंभीर विषाक्तता उत्पन्न हो सकती है,
- और कई मामलों में मृत्यु तक हो सकती है।
पिछले कुछ वर्षों में दुनिया के कई देशों में दूषित कफ सिरप और अन्य तरल दवाओं से बच्चों की मौत के मामले सामने आने के बाद इन रसायनों की जांच पर विशेष जोर दिया जा रहा है।
अब जांच अनिवार्य
IPC ने बताया कि भारतीय फार्माकोपिया (IP) 2022 की संशोधन सूची-09, जो 10 अक्टूबर 2025 से प्रभावी हुई है, के अनुसार सभी मौखिक तरल दवाओं में EG और DEG की जांच अनिवार्य कर दी गई है।
इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि बाजार में उपलब्ध सिरप और अन्य तरल दवाएं पूरी तरह सुरक्षित हों और उनमें किसी भी प्रकार का विषैला प्रदूषण न हो।
गुणवत्ता नियंत्रण पर दिया गया विशेष जोर
प्रशिक्षण के तकनीकी सत्रों में विशेषज्ञों ने प्रतिभागियों को बताया कि दवाओं में EG और DEG प्रदूषण किन स्रोतों से आ सकता है और इसे रोकने के लिए गुणवत्ता नियंत्रण उपायों को कैसे मजबूत किया जाए।
अधिकारियों को यह भी समझाया गया कि नियमित परीक्षण और वैज्ञानिक विश्लेषण के माध्यम से ऐसी मिलावट को शुरुआती स्तर पर ही पकड़ा जा सकता है, जिससे मरीजों की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।
देशभर की प्रयोगशालाओं को मिलेगा लाभ
IPC का मानना है कि इस तरह के प्रशिक्षण कार्यक्रमों से सरकारी दवा विश्लेषकों की तकनीकी दक्षता बढ़ेगी और विभिन्न राज्यों की प्रयोगशालाओं के बीच ज्ञान और अनुभव का आदान-प्रदान भी होगा।
आयोग ने कहा कि वह राज्य और केंद्र शासित प्रदेशों की औषधि परीक्षण प्रयोगशालाओं को तकनीकी सहायता, क्षमता निर्माण और विशेष प्रशिक्षण प्रदान करता रहेगा, ताकि पूरे देश में भारतीय फार्माकोपिया मानकों का प्रभावी अनुपालन सुनिश्चित हो सके।
दवा सुरक्षा की दिशा में महत्वपूर्ण पहल
विशेषज्ञों का मानना है कि दवाओं में जहरीले रसायनों की पहचान और रोकथाम के लिए यह प्रशिक्षण कार्यक्रम एक महत्वपूर्ण कदम है। इससे सरकारी प्रयोगशालाओं की जांच क्षमता मजबूत होगी और बाजार में उपलब्ध दवाओं की गुणवत्ता पर निगरानी और अधिक प्रभावी बन सकेगी। अंततः इसका लाभ मरीजों को सुरक्षित, गुणवत्तापूर्ण और भरोसेमंद दवाओं के रूप में मिलेगा।



