करोड़ों की नकली दवाओं का खेल उजागर: असली बिल, नकली दवाएं और मौत का नेटवर्क बेनकाब
उत्तर प्रदेश से लेकर उत्तराखंड तक फैले नकली दवाओं के काले कारोबार ने देश की दवा सुरक्षा व्यवस्था पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। आगरा, लखनऊ, अलीगढ़ और रुड़की को जोड़ने वाले इस अंतर्राज्यीय सिंडिकेट ने जिस सुनियोजित तरीके से करोड़ों रुपये की नकली दवाओं का जाल बिछाया, उसने औषधि विभाग और पुलिस को भी चौंका दिया है। जांच एजेंसियों के अनुसार शुरुआती पड़ताल में करीब 500 करोड़ रुपये की संदिग्ध दवाओं की बिक्री का अनुमान है।

मामले का खुलासा तब हुआ जब दिल्ली में एक संदिग्ध दवा का सैंपल जांच में नकली पाया गया। इसके बाद जांच की सुई लखनऊ की एक दवा फर्म की ओर घूमी। पहली नजर में रिकॉर्ड और बिल पूरी तरह असली दिखाई दिए, लेकिन जैसे ही अधिकारियों ने लैपटॉप की डिजिटल जांच शुरू की, एक ऐसा फर्जीवाड़ा सामने आया जिसने पूरे नेटवर्क की पोल खोल दी।

जांच में पाया गया कि एक ही असली बिल के जरिए कई एजेंसियों और राज्यों में दवाओं की सप्लाई दिखाई जा रही थी। यानी बिल असली, लेकिन दवाएं नकली। इसी फर्जी सिस्टम की आड़ में टीबी, मधुमेह, एलर्जी, पेट रोग और दर्द निवारक जैसी जरूरी दवाओं के नकली वर्जन बाजार में धड़ल्ले से बेचे जा रहे थे।
मुख्यालय स्तर से गठित 30 औषधि निरीक्षकों की विशेष टीम ने आगरा में ताबड़तोड़ छापेमारी की। कार्रवाई के दौरान 15 मेडिकल स्टोरों पर छापे मारे गए, जिनमें से तीन को तत्काल सीज कर दिया गया। करोड़ों रुपये की दवाएं जब्त की गईं, जबकि कई कारोबारी कार्रवाई की भनक लगते ही फरार हो गए। जांच के दौरान अधिकारियों को नकली दवाओं के अलावा भारी मात्रा में “फिजीशियन सैंपल” और “सरकारी सप्लाई” की दवाएं भी मिलीं, जिन्हें बाजार में खुलेआम बेचा जा रहा था।

औषधि विभाग के अधिकारियों के मुताबिक यह नेटवर्क बेहद संगठित तरीके से काम करता था। दवा प्रतिनिधियों, हॉकरों और विक्रेताओं तक का कमीशन पहले से तय रहता था। सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि छापेमारी में एक विशेष केमिकल बरामद हुआ, जिसका इस्तेमाल दवाओं पर लिखे “Not For Sale” और “Hospital Supply” जैसे निशानों को मिटाने के लिए किया जाता था। इसके बाद इन्हें बाजार में असली दवा की तरह ऊंचे दामों पर बेच दिया जाता था।
जांच में सामने आया कि गिरोह नामी कंपनियों के नाम से नकली दवाएं तैयार कराता था। पैकेजिंग, बैच नंबर, स्ट्रिप डिजाइन और प्रिंटिंग इतनी सटीक होती थी कि आम ग्राहक तो क्या, कई बार मेडिकल स्टोर संचालक भी धोखा खा जाते थे। खरीदारों को असली फर्म के बिल दिए जाते थे ताकि किसी को शक न हो। जब बाजार में भारी मात्रा में नकली दवाएं पहुंचने से असली कंपनियों की बिक्री प्रभावित होती थी, तब शिकायतें शुरू होती थीं और मामला पकड़ में आता था।

आगरा के फव्वारा स्थित झूलेलाल बाजार में कार्रवाई के दौरान टीम ने तीसरी मंजिल पर बने एक अवैध गोदाम का भंडाफोड़ किया। यहां से करीब 1.50 करोड़ रुपये कीमत की 30 नामी कंपनियों की फिजीशियन सैंपल दवाएं बरामद की गईं। जांच में पता चला कि यह गोदाम ज्योति ड्रग हाउस से जुड़ा हुआ था और कर्मचारी के नाम पर किराए पर लिया गया था। पुलिस और प्रशासन की मौजूदगी में गोदाम का ताला तोड़ा गया। करीब 20 घंटे चली कार्रवाई के बाद दवाओं को 30 बोरों में भरकर सीज किया गया।
इसी दौरान दर्द निवारक दवा “Oxalgin DP” के नकली नेटवर्क का भी खुलासा हुआ। जांच में सामने आया कि आगरा, अलीगढ़ और रुड़की के जरिए इस नकली दवा का उत्पादन और वितरण किया जा रहा था। अधिकारियों के अनुसार अप्रैल 2025 से अब तक करीब 1.78 लाख पत्ते नकली ऑक्सालजिन डीपी बाजार में खपाए जा चुके हैं।
पूछताछ में यह भी सामने आया कि नकली दवाएं अलीगढ़ से बसों के जरिए बिना बिल आगरा भेजी जाती थीं। आरोपी बातचीत के लिए व्हाट्सएप कॉल का इस्तेमाल करते थे ताकि रिकॉर्ड न बन सके, जबकि भुगतान हवाला नेटवर्क के जरिए किया जाता था। पहचान छिपाने के लिए पांच रुपये के नोट के सीरियल नंबर को कोड की तरह प्रयोग किया जाता था।
जांच की कड़ियां उत्तराखंड के रुड़की तक भी पहुंचीं। यहां स्थित एक फार्मास्युटिकल यूनिट पर छापेमारी में भारी मात्रा में खाली फॉयल, पीवीसी कैविटी और पैकिंग सामग्री बरामद हुई। टीम ने 90 किलो पीवीसी फॉयल और कई किलो स्ट्रिप रोल जब्त किए। फैक्ट्री संचालक वैध दस्तावेज नहीं दिखा सके। इसके बाद पुलिस ने आगरा, अलीगढ़ और रुड़की से जुड़े कई आरोपियों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर लिया है।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि नकली दवाएं सिर्फ धोखाधड़ी नहीं, बल्कि “धीमा जहर” हैं। इनमें मानक के अनुरूप रसायन नहीं होते, जिससे लीवर, किडनी और हृदय पर गंभीर असर पड़ सकता है। कई मामलों में मरीज की बीमारी ठीक होने की बजाय और गंभीर हो जाती है। सबसे खतरनाक बात यह है कि लगातार नकली दवाओं के सेवन से शरीर पर असली दवाओं का असर भी कम होने लगता है।
यह खुलासा देश की दवा वितरण प्रणाली में मौजूद बड़ी खामियों को उजागर करता है। सवाल यह भी है कि आखिर करोड़ों रुपये की नकली दवाएं वर्षों तक बाजार में बिकती रहीं और सिस्टम को भनक तक नहीं लगी। अब जरूरत सिर्फ कार्रवाई की नहीं, बल्कि दवा सप्लाई चेन की डिजिटल मॉनिटरिंग, मेडिकल स्टोरों की सख्त ऑडिटिंग और नकली दवा माफियाओं के खिलाफ कठोर कानूनी कार्रवाई की है।
विशेषज्ञ लोगों से अपील कर रहे हैं कि दवा खरीदते समय हमेशा बिल लें, बैच नंबर मिलाएं और किसी भी संदिग्ध दवा की तुरंत शिकायत करें। क्योंकि नकली दवाओं का यह खेल सिर्फ आर्थिक अपराध नहीं, बल्कि लोगों की जिंदगी से खिलवाड़ है।



