DCGI का सख्त संदेश: संशोधित शेड्यूल-M पर अब कोई और राहत नहीं, गुणवत्ता से समझौता करने वालों के लिए चेतावनी

DCGI का सख्त संदेश: संशोधित शेड्यूल-M पर अब कोई और राहत नहीं, गुणवत्ता से समझौता करने वालों के लिए चेतावनी

भारत के औषधि महानियंत्रक (DCGI) डॉ. राजीव सिंह रघुवंशी ने फार्मास्यूटिकल उद्योग को स्पष्ट संदेश देते हुए कहा है कि संशोधित शेड्यूल-M के अनुपालन में अब किसी भी प्रकार की अतिरिक्त मोहलत की उम्मीद नहीं की जानी चाहिए। चेन्नई ट्रेड सेंटर में आयोजित फार्मैक साउथ एक्सपो (Pharmac South Expo) के उद्घाटन सत्र को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि भारत की “फार्मेसी ऑफ द वर्ल्ड” की पहचान को बनाए रखने के लिए गुड मैन्युफैक्चरिंग प्रैक्टिसेज (GMP) का सख्ती से पालन ही एकमात्र रास्ता है।

डॉ. रघुवंशी का यह बयान ऐसे समय आया है जब देशभर की हजारों दवा निर्माण इकाइयाँ संशोधित शेड्यूल-M के तहत अपने संयंत्रों और गुणवत्ता प्रणालियों को अपग्रेड करने की प्रक्रिया में हैं। उन्होंने स्पष्ट कर दिया कि सरकार गुणवत्ता सुधार के मुद्दे पर पीछे हटने वाली नहीं है और उद्योग को अब नई व्यवस्था के अनुरूप स्वयं को ढालना होगा।

मात्रा नहीं, गुणवत्ता पर हो फोकस

अपने संबोधन में DCGI ने कहा कि भारत वर्तमान में वैश्विक दवा उत्पादन में लगभग 20 प्रतिशत हिस्सेदारी रखता है और यह उद्योग करीब 60 अरब अमेरिकी डॉलर का है। हालांकि, भारत का लक्ष्य वर्ष 2047 तक 450 अरब डॉलर के फार्मास्यूटिकल बाजार तक पहुंचना है।

उन्होंने कहा कि भविष्य केवल अधिक उत्पादन करने से नहीं बनेगा, बल्कि अनुसंधान, नवाचार और नई दवाओं की खोज में नेतृत्व स्थापित करने से बनेगा। उनके अनुसार फार्मास्यूटिकल उद्योग कोई सामान्य व्यापार नहीं बल्कि समाज की सेवा से जुड़ा क्षेत्र है, जहां मुनाफे से अधिक महत्वपूर्ण मरीजों की सुरक्षा है।

गुणवत्ता में चूक के गंभीर परिणाम

DCGI ने अपने भाषण में उन घटनाओं का भी उल्लेख किया जिन्होंने भारतीय दवा उद्योग की छवि को नुकसान पहुंचाया। उन्होंने छिंदवाड़ा में बच्चों की मौत, बल्लारी में दूषित IV फ्लूइड से जुड़ी घटनाओं तथा उज्बेकिस्तान में भारतीय कफ सिरप Doc-1 Max विवाद का हवाला देते हुए कहा कि ऐसी घटनाएं केवल नियामकीय विफलता नहीं बल्कि जनता के विश्वास को तोड़ने वाली त्रासदियां हैं।

उन्होंने कहा कि जब किसी दवा या चिकित्सा उत्पाद की गुणवत्ता में कमी के कारण जान जाती है, तब बाद में की गई नियामकीय कार्रवाई उस नुकसान की भरपाई नहीं कर सकती। इसलिए गुणवत्ता नियंत्रण को उत्पादन प्रक्रिया का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा बनाया जाना चाहिए।

संशोधित शेड्यूल-M क्यों है महत्वपूर्ण?

डॉ. रघुवंशी ने कहा कि संशोधित शेड्यूल-M को उद्योग पर अतिरिक्त बोझ के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। यह उन त्रुटियों और जोखिमों को रोकने का एक वैज्ञानिक ढांचा है जो भविष्य में बड़े स्वास्थ्य संकटों का कारण बन सकते हैं।

नए प्रावधानों के तहत कच्चे माल की जांच, उत्पादन प्रक्रिया की निगरानी, गुणवत्ता परीक्षण, दस्तावेजीकरण और जोखिम प्रबंधन को अधिक सुदृढ़ बनाया गया है। उनका कहना था कि यदि उद्योग अभी भी गुणवत्ता आधारित संस्कृति नहीं अपनाता है तो भविष्य में ऐसा परिवर्तन और अधिक कठिन हो जाएगा।

तमिलनाडु उद्योग की सराहना

DCGI ने तमिलनाडु के फार्मास्यूटिकल सेक्टर की प्रशंसा करते हुए कहा कि राज्य के MSME दवा उद्योगों में लगभग 80 प्रतिशत कार्यबल प्रशिक्षित और योग्य पेशेवरों का है। उन्होंने इन इकाइयों से देश के अन्य राज्यों के लिए उदाहरण बनने का आह्वान किया।

उनका मानना है कि तकनीकी रूप से सक्षम मानव संसाधन और बेहतर गुणवत्ता प्रणालियां भारतीय उद्योग को वैश्विक प्रतिस्पर्धा में आगे ले जा सकती हैं।

डिजिटल रेगुलेटरी सिस्टम की तैयारी

उद्योग को समर्थन देने के लिए DCGI ने यह भी घोषणा की कि देश की औषधि नियामक प्रणाली में व्यापक बदलाव किए जा रहे हैं। इसके तहत नए वैज्ञानिक पदों का सृजन, नियामक क्षमता का विस्तार तथा एक एकीकृत डिजिटल प्लेटफॉर्म विकसित किया जा रहा है।

यह डिजिटल प्रणाली अनुपालन, निरीक्षण और निगरानी प्रक्रियाओं को अधिक पारदर्शी और प्रभावी बनाएगी। सरकार का उद्देश्य नियामकों और उद्योग के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करना तथा आधुनिक चुनौतियों के अनुरूप नियामक ढांचा तैयार करना है।

MSME उद्योग के लिए बढ़ सकती हैं चुनौतियां

विशेषज्ञों का मानना है कि संशोधित शेड्यूल-M का सबसे बड़ा प्रभाव छोटे और मध्यम दवा निर्माताओं (MSMEs) पर पड़ेगा। कई इकाइयों को बुनियादी ढांचे, HVAC सिस्टम, गुणवत्ता नियंत्रण प्रयोगशालाओं, दस्तावेजीकरण और प्रशिक्षण पर अतिरिक्त निवेश करना पड़ रहा है।

हालांकि सरकार का तर्क है कि ये निवेश दीर्घकाल में भारतीय दवा उद्योग की वैश्विक विश्वसनीयता बढ़ाएंगे और निर्यात बाजारों में नई संभावनाएं खोलेंगे।

फार्मैक साउथ एक्सपो में DCGI का संदेश पूरी तरह स्पष्ट था—संशोधित शेड्यूल-M के अनुपालन पर अब कोई समझौता नहीं होगा। सरकार सुधारों को लागू करने के लिए प्रतिबद्ध है और उद्योग को भी अपनी जिम्मेदारी निभानी होगी। यदि भारत को विश्वसनीय वैश्विक दवा आपूर्तिकर्ता के रूप में अपनी स्थिति बनाए रखनी है, तो गुणवत्ता, GMP अनुपालन और मरीजों की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देनी होगी।

डॉ. रघुवंशी के शब्दों में, “गुणवत्ता पर समझौते का दौर अब समाप्त होना चाहिए।” यही संदेश आने वाले वर्षों में भारतीय फार्मास्यूटिकल उद्योग की दिशा तय करेगा।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *