मुफ्त दवा योजना अटकी, कंपनियों पर अनिवार्यता टली
गरीब मरीजों को बड़ा झटका, अब कंपनियों की मर्जी पर निर्भर होगी मुफ्त दवाएं
दिल्ली :- देश में गरीब और जरूरतमंद मरीजों को मुफ्त दवाएं उपलब्ध कराने की योजना को बड़ा झटका लगा है। औषधि तकनीकी सलाहकार बोर्ड (DTAB) ने उस प्रस्ताव को आगे न बढ़ाने का फैसला लिया है, जिसमें दवा कंपनियों को अपने मुनाफे का एक हिस्सा मुफ्त दवाओं के लिए खर्च करना अनिवार्य किया जाना था।
इस प्रस्ताव के तहत दवा कंपनियों को अपने शुद्ध लाभ का कम से कम 1 प्रतिशत हिस्सा “औषधि बैंक” में देना था। इन दवाओं का इस्तेमाल आपात स्थिति, महामारी, प्राकृतिक आपदाओं और सरकारी स्वास्थ्य योजनाओं में किया जाना प्रस्तावित था। अगर यह नियम लागू होता, तो देश के लाखों गरीब मरीजों को सीधी राहत मिल सकती थी।
हालांकि, DTAB की 93वीं बैठक में इस प्रस्ताव पर विस्तार से चर्चा के बाद इसे रोकने का निर्णय लिया गया। बोर्ड का कहना है कि ऐसा प्रावधान औषधि एवं सौंदर्य प्रसाधन कानून के दायरे में नहीं आता। यानी इस कानून के जरिए कंपनियों को CSR (कॉर्पोरेट सामाजिक जिम्मेदारी) के तहत खर्च करने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता।
दरअसल, CSR से जुड़े नियम पहले से ही कंपनी अधिनियम, 2013 के अंतर्गत तय हैं। इसके मुताबिक कंपनियों को अपने मुनाफे का 2 प्रतिशत सामाजिक कार्यों में खर्च करना अनिवार्य है, लेकिन वे यह खुद तय करती हैं कि यह राशि कहां खर्च की जाएगी। ऐसे में दवा कंपनियों को विशेष रूप से मुफ्त दवाओं के लिए बाध्य करना मौजूदा कानूनी ढांचे से बाहर माना गया।
यह मुद्दा नया नहीं है। साल 2018 में भी इस पर चर्चा हुई थी, जब इसे स्वैच्छिक रूप से लागू करने की बात कही गई थी। बाद में 2024 में इसे फिर से उठाया गया, लेकिन अब इसे पूरी तरह ठंडे बस्ते में डाल दिया गया है।
इस फैसले का सबसे ज्यादा असर गरीब और मध्यम वर्ग के मरीजों पर पड़ सकता है। देश में आज भी बड़ी संख्या में लोग महंगी दवाओं के कारण इलाज नहीं करा पाते हैं। सरकारी अस्पतालों में दवाओं की कमी भी एक आम समस्या बनी हुई है, जिससे मरीजों को बाहर से महंगी दवाएं खरीदनी पड़ती हैं।
अगर यह प्रस्ताव लागू होता, तो “औषधि बैंक” के जरिए जरूरतमंद मरीजों को मुफ्त दवाएं आसानी से मिल सकती थीं और आपात स्थितियों में दवाओं की कमी को भी काफी हद तक दूर किया जा सकता था।
अब इस फैसले के बाद यह पूरी तरह दवा कंपनियों की इच्छा पर निर्भर करेगा कि वे CSR के तहत मुफ्त दवाओं के लिए कितना योगदान देती हैं। यानी किसी भी कंपनी पर यह कानूनी दबाव नहीं होगा कि वह इस दिशा में खर्च करे।
विशेषज्ञों का मानना है कि स्वास्थ्य जैसे संवेदनशील क्षेत्र में इस तरह की अनिवार्यता से बड़ा बदलाव आ सकता था। वहीं कुछ लोगों का यह भी कहना है कि कंपनियों को मजबूर करने के बजाय उन्हें स्वेच्छा से सामाजिक कार्यों के लिए प्रोत्साहित करना ज्यादा बेहतर है।
फिलहाल इतना तय है कि मुफ्त दवाओं की व्यवस्था को लेकर कोई ठोस और अनिवार्य प्रणाली अभी नहीं बन पाई है, जिससे गरीब मरीजों की उम्मीदों को झटका लगा है।
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