राजस्थान में माताओं की मौत के बाद दवा सिस्टम पर बड़ा सवाल: 24 दवाओं पर रोक से हड़कंप, उत्तराखंड तक पहुंची जांच की आंच
राजस्थान के कोटा स्थित न्यू मेडिकल कॉलेज अस्पताल (NMCH) में प्रसूताओं की मौत के मामले ने पूरे देश की स्वास्थ्य व्यवस्था को झकझोर दिया है। इस घटना के बाद राजस्थान सरकार ने बड़ा और सख्त कदम उठाते हुए 24 दवाओं और मेडिकल उपकरणों की सप्लाई, बिक्री और इस्तेमाल पर तत्काल रोक लगा दी है। ड्रग कंट्रोलर के इस फैसले ने सरकारी अस्पतालों में दवाओं की गुणवत्ता, सप्लाई चेन और निगरानी व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
सबसे बड़ा और चौंकाने वाला पहलू यह है कि जिन दवाओं और मेडिकल उपकरणों के सैंपल जांच के लिए उठाए गए हैं, उनमें कई कंपनियां उत्तराखंड से भी जुड़ी हुई हैं। यही वजह है कि अब इस पूरे मामले की आंच उत्तराखंड तक पहुंच गई है और राज्य के फार्मा व मेडिकल डिवाइस सेक्टर पर भी निगाहें टिक गई हैं।
कोटा अस्पताल में क्या हुआ?
कोटा के न्यू मेडिकल कॉलेज अस्पताल के पोस्ट-ऑपरेटिव गायनी वार्ड में प्रसूताओं की मौत की घटना सामने आने के बाद हड़कंप मच गया। प्रारंभिक जांच में चिकित्सा प्रोटोकॉल, पोस्ट-ऑपरेटिव मॉनिटरिंग और दवा प्रबंधन में गंभीर लापरवाही के संकेत मिले। इसके बाद राजस्थान ड्रग कंट्रोल विभाग ने वार्ड में इस्तेमाल हुई दवाओं और उपकरणों के सैंपल लेना शुरू किया।
जांच के दौरान कुल 24 दवाओं और मेडिकल उत्पादों की पहचान की गई, जिनके बैचों की सप्लाई और उपयोग पर फिलहाल रोक लगा दी गई है। इनमें एंटीबायोटिक इंजेक्शन, ग्लूकोज, रिंगर लैक्टेट, दर्द निवारक इंजेक्शन, एनेस्थीसिया दवाएं, सिरिंज, IV कैथेटर और इन्फ्यूजन सेट शामिल हैं।
राजस्थान सरकार ने साफ कहा है कि जब तक सरकारी विश्लेषक की कानूनी जांच रिपोर्ट नहीं आ जाती, तब तक इन बैचों की बिक्री और सप्लाई पूरी तरह बंद रहेगी।
उत्तराखंड का कनेक्शन क्यों अहम?
इस पूरे मामले में उत्तराखंड का नाम सामने आने से राज्य के फार्मा उद्योग में बेचैनी बढ़ गई है। जांच सूची में शामिल कुछ उत्पाद उत्तराखंड की कंपनियों द्वारा निर्मित बताए गए हैं।
इनमें काशीपुर स्थित कंपनी द्वारा निर्मित Metoclopramide Injection और हरिद्वार SIDCUL में बनी डिस्पोजेबल सिरिंज शामिल हैं। इसके अलावा देहरादून के सेलाकुई क्षेत्र में निर्मित IV कैथेटर भी जांच के दायरे में आया है।
उत्तराखंड लंबे समय से फार्मा और मेडिकल डिवाइस मैन्युफैक्चरिंग का बड़ा हब माना जाता है। हरिद्वार, देहरादून, सेलाकुई, काशीपुर और रुड़की में सैकड़ों दवा कंपनियां काम कर रही हैं। ऐसे में राजस्थान की घटना ने उत्तराखंड के ड्रग रेगुलेटरी सिस्टम पर भी दबाव बढ़ा दिया है।
क्या उत्तराखंड में भी शुरू होगी जांच?
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि राजस्थान की कार्रवाई के बाद उत्तराखंड ड्रग कंट्रोल प्रशासन भी सक्रिय हो सकता है। जिन कंपनियों के उत्पाद जांच सूची में आए हैं, उनके उत्पादन रिकॉर्ड, GMP अनुपालन, बैच टेस्टिंग और क्वालिटी कंट्रोल दस्तावेजों की जांच की संभावना बढ़ गई है।
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि किसी बैच में गुणवत्ता संबंधी गड़बड़ी मिलती है तो इसका असर केवल राजस्थान तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि देशभर में उन बैचों की रिकॉल प्रक्रिया शुरू हो सकती है।
सरकार का बड़ा एक्शन
राजस्थान सरकार ने मामले को बेहद गंभीर मानते हुए कई अधिकारियों और डॉक्टरों पर कार्रवाई शुरू कर दी है।
- जनरल सर्जरी विभाग के सह आचार्य डॉ. नवनीत कुमार को निलंबित किया गया।
- सहायक आचार्य डॉ. श्रद्धा उपाध्याय को बर्खास्त कर दिया गया।
- वरिष्ठ नर्सिंग अधिकारियों गुरजोत कौर और निमेश वर्मा को भी निलंबित कर मुख्यालय जयपुर अटैच किया गया।
- स्त्री एवं प्रसूति रोग विभाग के वरिष्ठ चिकित्सकों को कारण बताओ नोटिस जारी किए गए हैं।
मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने स्पष्ट कहा है कि मरीजों की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता है और किसी भी स्तर पर लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी।
दवा सप्लाई सिस्टम पर उठे बड़े सवाल
इस घटना ने सरकारी अस्पतालों में दवा खरीद और सप्लाई सिस्टम को लेकर गंभीर बहस छेड़ दी है। जिन दवाओं पर रोक लगी है, उनमें से अधिकांश RMSCL (राजस्थान मेडिकल सर्विसेज कॉर्पोरेशन लिमिटेड) के जरिए खरीदी गई थीं।
अब सवाल यह उठ रहा है कि:
- क्या सप्लाई से पहले गुणवत्ता जांच पर्याप्त थी?
- क्या अस्पताल स्तर पर दवाओं के उपयोग की निगरानी कमजोर थी?
- क्या पोस्ट-ऑपरेटिव प्रोटोकॉल का पालन नहीं हुआ?
- क्या दवा स्टोरेज और हैंडलिंग में चूक हुई?
उत्तराखंड के लिए
उत्तराखंड में पहले भी नकली और घटिया दवाओं के मामले सामने आते रहे हैं। हाल के महीनों में कई राज्यों में उत्तराखंड से जुड़ी फार्मा यूनिटों पर सवाल उठ चुके हैं। ऐसे में कोटा कांड राज्य के लिए एक बड़ी चेतावनी माना जा रहा है।
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि समय रहते सख्त निगरानी नहीं बढ़ाई गई तो उत्तराखंड की फार्मा इंडस्ट्री की विश्वसनीयता पर असर पड़ सकता है।
स्वास्थ्य क्षेत्र से जुड़े जानकारों ने सुझाव दिया है कि:
- हर बैच की ट्रेसबिलिटी अनिवार्य हो,
- सरकारी अस्पतालों में रियल टाइम फार्माकोविजिलेंस लागू हो,
- मेडिकल डिवाइस और इंजेक्शन की थर्ड पार्टी टेस्टिंग बढ़ाई जाए,
- और राज्यों के बीच ड्रग अलर्ट सिस्टम को और मजबूत किया जाए।
देशभर में बढ़ सकती है सतर्कता
कोटा की घटना के बाद अब कई राज्यों के ड्रग कंट्रोल विभाग अलर्ट मोड में आ सकते हैं। जिन कंपनियों की दवाएं विभिन्न राज्यों में सप्लाई हुई हैं, उनके स्टॉक की समीक्षा शुरू होने की संभावना है।
यह मामला केवल एक अस्पताल या एक राज्य तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि अब यह देश की सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था, दवा गुणवत्ता नियंत्रण और मरीज सुरक्षा का बड़ा राष्ट्रीय मुद्दा बनता जा रहा है।



