बड़ी खबर: दवाओं की गुणवत्ता पर सवाल, कई राज्यों ने नहीं दी रिपोर्ट—लोगों की सेहत से खिलवाड़?
नई दिल्ली/ देश में दवाओं की गुणवत्ता को लेकर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। (CDSCO) की ताजा रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि देश के करीब 19 राज्य और 5 केंद्र शासित प्रदेश अब तक गैर-मानक गुणवत्ता (NSQ) दवाओं का डेटा जमा ही नहीं कर रहे हैं। यह लापरवाही सीधे तौर पर आम लोगों की सेहत से जुड़ा बड़ा खतरा मानी जा रही है।
168 दवाएं फेल, कई बड़ी कंपनियों के सैंपल भी शामिल
मार्च 2026 की रिपोर्ट के अनुसार, पूरे देश में 168 दवाओं के नमूने गुणवत्ता जांच में फेल पाए गए। इनमें से 48 नमूने केंद्रीय प्रयोगशालाओं और 120 नमूने राज्य प्रयोगशालाओं में असफल रहे। हैरानी की बात यह है कि इस सूची में देश की नामी दवा कंपनियों जैसे , और के उत्पाद भी शामिल हैं।
इनमें एंटीबायोटिक, बुखार की दवा और पेट से जुड़ी दवाएं तक शामिल हैं। यानी ऐसी दवाएं, जिनका इस्तेमाल रोजाना लाखों लोग करते हैं।
उत्तराखंड समेत कई राज्यों ने नहीं भेजा डेटा
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि , , , , और जैसे बड़े राज्य इस मामले में पीछे हैं और उन्होंने समय पर डेटा जमा नहीं किया।
यह स्थिति इसलिए और गंभीर हो जाती है क्योंकि इन राज्यों की आबादी करोड़ों में है। ऐसे में सवाल उठता है कि अगर डेटा ही नहीं आएगा, तो खराब दवाओं की पहचान कैसे होगी?
सरकारी कंपनियों की दवाएं भी फेल
रिपोर्ट में यह भी सामने आया है कि सरकारी कंपनियों की दवाएं भी गुणवत्ता जांच में फेल हुई हैं। की सहायक कंपनी और के उत्पाद भी NSQ पाए गए।
इससे साफ है कि समस्या सिर्फ प्राइवेट सेक्टर तक सीमित नहीं है, बल्कि सरकारी सिस्टम में भी खामियां मौजूद हैं।
नकली दवा का भी मामला आया सामने
मार्च महीने में एक और बड़ा खुलासा हुआ। से मिली एक इंजेक्शन दवा को नकली पाया गया। बताया गया कि यह दवा किसी अधिकृत कंपनी की नहीं थी, बल्कि फर्जी तरीके से ब्रांड नाम का इस्तेमाल कर बनाई गई थी।
यह मामला बेहद गंभीर है क्योंकि नकली दवाएं सीधे मरीज की जान के लिए खतरा बन सकती हैं। फिलहाल इस मामले की जांच जारी है।
क्या होता है NSQ दवा?
सरल भाषा में समझें तो NSQ यानी “Non-Standard Quality” दवाएं वे होती हैं जो तय मानकों पर खरी नहीं उतरतीं। इनमें दवा की मात्रा कम-ज्यादा हो सकती है, असर सही नहीं होता या गुणवत्ता खराब होती है।
हालांकि CDSCO का कहना है कि किसी एक बैच के फेल होने का मतलब यह नहीं कि पूरी कंपनी की सभी दवाएं खराब हैं। फिर भी यह एक गंभीर चेतावनी जरूर है।
हर साल बढ़ रहे हैं ऐसे मामले
आंकड़ों पर नजर डालें तो समस्या तेजी से बढ़ रही है।
- साल 2024 में 877 दवाएं NSQ पाई गई थीं
- वहीं 2025 में यह संख्या बढ़कर 1879 हो गई
यानी एक साल में दोगुने से ज्यादा बढ़ोतरी। विशेषज्ञ मानते हैं कि यह बढ़ती जांच और राज्यों की भागीदारी का नतीजा है, लेकिन यह भी सच है कि सिस्टम में खामियां उजागर हो रही हैं।
सवालों के घेरे में राज्य सरकारें
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब केंद्र सरकार लगातार निगरानी कर रही है, तो राज्य सरकारें डेटा देने में पीछे क्यों हैं? क्या यह लापरवाही है या सिस्टम की कमजोरी?
विशेषज्ञों का कहना है कि अगर राज्यों ने समय पर रिपोर्टिंग नहीं की, तो खराब और नकली दवाएं बाजार में लंबे समय तक बिकती रहेंगी, जिससे आम जनता की सेहत पर सीधा असर पड़ेगा।
आम लोगों के लिए क्या खतरा?
- दवा असर नहीं करेगी
- बीमारी बढ़ सकती है
- साइड इफेक्ट का खतरा
- गंभीर मामलों में जान का जोखिम
क्या किया जा रहा है?
CDSCO ने साफ किया है कि यह कार्रवाई लगातार चल रही है और राज्यों के साथ मिलकर ऐसी दवाओं को बाजार से हटाया जा रहा है। साथ ही नकली दवाओं के खिलाफ सख्त कार्रवाई की बात भी कही गई है।
दवाओं की गुणवत्ता पर उठ रहे ये सवाल देश के स्वास्थ्य सिस्टम के लिए एक बड़ा अलार्म हैं। खासकर जब कई राज्य समय पर डेटा ही नहीं दे रहे, तो यह स्थिति और खतरनाक बन जाती है।
अब जरूरत है सख्त निगरानी, पारदर्शिता और जवाबदेही की—ताकि मरीजों की जान के साथ किसी भी तरह का समझौता न हो।



