ONDLS पोर्टल की खामियों से उत्तराखंड का फार्मा उद्योग बेहाल, लाइसेंस प्रक्रिया पर संकट गहराया

ONDLS पोर्टल की खामियों से उत्तराखंड का फार्मा उद्योग बेहाल, लाइसेंस प्रक्रिया पर संकट गहराया

देहरादून/हरिद्वार: देश के प्रमुख फार्मा हब के रूप में पहचान बना चुके उत्तराखंड में इन दिनों दवा निर्माण से जुड़ी कंपनियां एक नई डिजिटल चुनौती से जूझ रही हैं। केंद्र सरकार द्वारा लागू की गई ऑनलाइन लाइसेंसिंग प्रणाली—ONDLS (Online National Drugs Licensing System)—का उद्देश्य प्रक्रियाओं को सरल, पारदर्शी और तेज बनाना था, लेकिन जमीनी हकीकत इससे उलट नजर आ रही है। तकनीकी खामियों और सिस्टम की कमजोरी के चलते राज्य की फार्मा इंडस्ट्री परेशान है और इसका सीधा असर उत्पादन और लाइसेंसिंग प्रक्रिया पर पड़ रहा है।


डिजिटल व्यवस्था बनी परेशानी का कारण

Central Drugs Standard Control Organization (CDSCO) ने हाल के समय में कई प्रकार के ड्रग लाइसेंस—जैसे नई दवाओं की मंजूरी, मैन्युफैक्चरिंग लाइसेंस और रिन्यूअल—के लिए ONDLS पोर्टल को अनिवार्य कर दिया है। इसका मतलब यह है कि अब फार्मा कंपनियों के पास ऑफलाइन आवेदन का विकल्प लगभग समाप्त हो चुका है और उन्हें पूरी तरह इस डिजिटल प्लेटफॉर्म पर निर्भर रहना पड़ रहा है।

हालांकि, उद्योग से जुड़े लोगों का कहना है कि जिस सिस्टम से काम आसान होना चाहिए था, वही अब सबसे बड़ी बाधा बनता जा रहा है।


तकनीकी खामियों से जूझ रही कंपनियां

उत्तराखंड के हरिद्वार, देहरादून और सिडकुल इंडस्ट्रियल एरिया में संचालित सैकड़ों फार्मा यूनिट्स ONDLS पोर्टल की विभिन्न तकनीकी समस्याओं से परेशान हैं। कंपनियों के अनुसार, पोर्टल अक्सर स्लो हो जाता है या अचानक क्रैश कर जाता है, जिससे आवेदन भरने की प्रक्रिया बीच में ही रुक जाती है।

सबसे बड़ी समस्या डेटा सेव न होने की है। कई बार कंपनियां घंटों मेहनत से आवेदन भरती हैं, लेकिन सबमिट करते समय डेटा गायब हो जाता है या सिस्टम एरर दिखाता है। इसके अलावा, डॉक्यूमेंट अपलोड करने में भी बार-बार फेल्योर देखने को मिल रहा है। PDF फाइलें अपलोड नहीं होतीं या फॉर्मेट एरर दिखाया जाता है, जिससे आवेदन अधूरा रह जाता है।

लॉगिन और OTP से जुड़ी समस्याएं भी आम हैं। कई यूजर्स को OTP समय पर नहीं मिलता, जिससे वे सिस्टम में लॉगिन नहीं कर पाते। कुछ मामलों में बार-बार लॉगआउट होने की शिकायतें भी सामने आई हैं।


लाइसेंस प्रक्रिया पर पड़ा सीधा असर

ONDLS पोर्टल की इन खामियों का सबसे बड़ा असर लाइसेंस प्रक्रिया पर पड़ा है। नई दवाओं की मंजूरी में देरी हो रही है, जिससे कंपनियों के नए प्रोडक्ट लॉन्च अटक रहे हैं। वहीं, जिन कंपनियों के लाइसेंस रिन्यूअल लंबित हैं, उनके सामने उत्पादन रोकने की स्थिति तक बन रही है।

कई कंपनियों का कहना है कि आवेदन सबमिट करने के बाद भी उनकी फाइलें लंबे समय तक “Pending” दिखती रहती हैं और स्टेटस अपडेट नहीं होता। इससे यह स्पष्ट नहीं हो पाता कि आवेदन किस स्तर पर अटका हुआ है।


छोटे उद्योग सबसे ज्यादा प्रभावित

ONDLS पोर्टल की समस्याओं का सबसे ज्यादा असर छोटे और मझोले फार्मा मैन्युफैक्चरर्स पर पड़ रहा है। बड़ी कंपनियों के पास जहां आईटी सपोर्ट और संसाधन होते हैं, वहीं छोटे उद्योग इन तकनीकी दिक्कतों को संभालने में सक्षम नहीं होते।

ऐसे कई छोटे उद्यमी हैं जो खुद ही आवेदन प्रक्रिया संभालते हैं। उनके लिए बार-बार की तकनीकी गड़बड़ियां न केवल समय की बर्बादी हैं, बल्कि आर्थिक नुकसान का कारण भी बन रही हैं।


उद्योग पर बढ़ता दबाव

उत्तराखंड का फार्मा सेक्टर पहले से ही सख्त नियामक निगरानी के दौर से गुजर रहा है। दवाओं की गुणवत्ता, नकली दवाओं पर कार्रवाई और लाइसेंसिंग नियमों को लेकर सरकार लगातार सख्ती बरत रही है। ऐसे में ONDLS पोर्टल की खामियां उद्योग पर अतिरिक्त दबाव बना रही हैं।

उद्योग जगत का कहना है कि वे नियमों का पालन करने के लिए तैयार हैं, लेकिन सिस्टम का सुचारू रूप से काम करना भी उतना ही जरूरी है।


कंपनियों की मांग क्या है?

फार्मा कंपनियों और उद्योग संगठनों ने सरकार से मांग की है कि ONDLS पोर्टल की तकनीकी क्षमता को जल्द से जल्द सुधारा जाए। साथ ही हेल्पडेस्क और टेक्निकल सपोर्ट को मजबूत करने की भी जरूरत बताई गई है।

कंपनियों का कहना है कि आवेदन में सुधार (Edit) और री-सबमिशन का विकल्प आसान होना चाहिए, ताकि छोटी तकनीकी गलतियों के कारण आवेदन रिजेक्ट न हों। इसके अलावा, कुछ समय के लिए ऑफलाइन या वैकल्पिक व्यवस्था भी उपलब्ध कराने की मांग की जा रही है, ताकि उद्योग का काम प्रभावित न हो।


उत्तराखंड का फार्मा उद्योग इस समय डिजिटल ट्रांजिशन के अहम दौर से गुजर रहा है। ONDLS पोर्टल जैसे सिस्टम भविष्य के लिए जरूरी हैं, लेकिन उनकी तकनीकी मजबूती और विश्वसनीयता भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।

अगर जल्द ही इन खामियों को दूर नहीं किया गया, तो इसका असर न केवल दवा निर्माण उद्योग पर पड़ेगा, बल्कि दवाओं की उपलब्धता और सप्लाई चेन भी प्रभावित हो सकती है। ऐसे में यह जरूरी हो जाता है कि सरकार और संबंधित एजेंसियां इस समस्या को गंभीरता से लें और त्वरित समाधान सुनिश्चित करें।

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