लिवर ठीक करने की दवा बन गई ज़हर! नकली दवाओं का कॉर्पोरेट खेल बेनकाब, 50 हजार गोलियां बरामद
गाजियाबाद। जिस दवा को लोग लिवर बचाने की आख़िरी उम्मीद समझकर खाते हैं, वही दवा अगर बीमारी की वजह बन जाए तो? गाजियाबाद में ठीक यही खौफनाक सच सामने आया है। यहां लिवर की बीमारी ठीक करने के नाम पर नकली दवाओं का एक संगठित और कॉर्पोरेट स्टाइल गिरोह वर्षों से सक्रिय था। पुलिस ने मुरादनगर इलाके में छापा मारकर 50 हजार नकली गोलियां, पैकेजिंग मटेरियल और सप्लाई में इस्तेमाल की जा रही कार के साथ पांच आरोपियों को गिरफ्तार किया है।
यह कोई छोटा-मोटा फर्जीवाड़ा नहीं, बल्कि स्वास्थ्य से खुला खिलवाड़ और करोड़ों के अवैध मुनाफे का संगठित नेटवर्क था।
लिवर की दवा, लेकिन बीमारी की गारंटी!
पुलिस जांच में सामने आया है कि आरोपी एक नामी कंपनी की लिवर ठीक करने वाली लोकप्रिय दवा की हूबहू नकल तैयार कर रहे थे। दवा की पैकिंग, रैपर, ढक्कन, डिब्बी और यहां तक कि फर्जी बिल भी ऐसे बनाए जाते थे कि मेडिकल स्टोर संचालकों को कोई शक न हो।
सबसे डरावनी बात यह है कि यह नकली दवा उत्तर प्रदेश ही नहीं, बल्कि कई अन्य राज्यों में भी सप्लाई की जा रही थी। यानी हजारों मरीज अनजाने में ज़हर खा रहे थे।
कॉर्पोरेट अंदाज़ में चलता था नकली दवाओं का धंधा
इस गिरोह की सबसे चौंकाने वाली बात यह थी कि पूरा नेटवर्क कॉर्पोरेट सिस्टम की तरह काम करता था।
- कोई दवा बनवाने का काम संभालता था
- कोई पैकिंग और लेबलिंग
- कोई ट्रांसपोर्ट और कोरियर
- तो कोई मेडिकल दुकानों तक सप्लाई
हर व्यक्ति की भूमिका तय थी, ताकि शक की गुंजाइश ही न रहे।
पांच आरोपी गिरफ्तार, क्या-क्या बरामद हुआ?
थाना मुरादनगर पुलिस ने कार्रवाई करते हुए जिन पांच आरोपियों को गिरफ्तार किया है, उनके नाम हैं—
मयंक अग्रवाल, अनुज गर्ग, तुषार ठाकुर, आकाश ठाकुर और नितिन त्यागी।
पुलिस ने उनके कब्जे से:
- 500 रैपर सीट
- 1200 ढक्कन
- 1200 प्लास्टिक की डिब्बियां
- 50,000 नकली टैबलेट
- एक वैगनआर कार
बरामद की है।
ग्रेजुएट से लेकर आठवीं पास तक शामिल
इस गिरोह में शामिल लोगों की प्रोफाइल भी हैरान करने वाली है।
- मयंक अग्रवाल – ग्रेजुएट, मेरठ में होलसेल दवाओं का काम
- तुषार ठाकुर – रेडियोलॉजिस्ट की पढ़ाई कर रहा
- आकाश ठाकुर और अनुज गर्ग – इलेक्ट्रीशियन, आठवीं पास
- नितिन त्यागी – मोदीनगर में मेडिकल स्टोर संचालक
यानी पढ़ा-लिखा व्यापारी, मेडिकल से जुड़ा व्यक्ति और तकनीकी कामगार—सभी इस काले कारोबार में शामिल थे।
₹35 की लागत, ₹300 की एमआरपी!
पुलिस के अनुसार, जिस दवा की बाजार में एमआरपी करीब ₹300 है, वही नकली दवा इन्हें सिर्फ ₹35 प्रति पैक में तैयार हो जाती थी।
इसके बाद इसे ₹90 से ₹120 में मेडिकल दुकानों को सप्लाई किया जाता था।
मुनाफा इतना ज्यादा था कि लालच में इंसानी जान की कीमत शून्य हो गई।
दुकानदारों को भी नहीं होता था शक
आरोपी दुकानदारों को भरोसे में लेने के लिए फर्जी लेकिन असली जैसे दिखने वाले बिल भी देते थे।
यही वजह रही कि मेडिकल स्टोर संचालकों को लंबे समय तक शक नहीं हुआ और नकली दवा मरीजों तक पहुंचती रही।
पुलिस का बयान
डीसीपी रूरल गाजियाबाद सुरेंद्र नाथ तिवारी ने बताया कि गिरोह के सभी सदस्यों के काम बंटे हुए थे।
“हमें नकली दवा बिकने की सूचना मिली थी। जांच के बाद कार्रवाई की गई। पांच आरोपी गिरफ्तार किए गए हैं और 50 हजार टैबलेट बरामद हुई हैं। दवा के सैंपल ड्रग विभाग को भेजे जा रहे हैं और आगे की जांच जारी है।”
बड़ा सवाल: कितने मरीज हो चुके हैं शिकार?
अब सबसे बड़ा और डरावना सवाल यह है कि—
👉 अब तक कितने मरीज इस नकली दवा को खा चुके हैं?
👉 कितनों की सेहत बिगड़ी या जान पर बन आई?
इसका जवाब जांच के बाद ही सामने आएगा, लेकिन यह मामला साफ करता है कि नकली दवाओं का नेटवर्क हमारे सिस्टम में कितनी गहराई तक घुस चुका हैं


