केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय का बड़ा फैसला दवाओं के क्यूआर कोड में अब एक्सीपिएंट्स का विवरण अनिवार्य
स्वास्थ्य मंत्रालय ने अधिसूचना जारी की, 1 मार्च 2026 से होगा लागू
नई दिल्ली। दवाओं के लेबल और पैकेजिंग से जुड़ी जानकारी में अब एक बड़ा बदलाव होने जा रहा है। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने औषधि नियम, 1945 में संशोधन करते हुए यह अनिवार्य कर दिया है कि दवाओं के पैकेज पर मौजूद क्यूआर कोड या बारकोड में अब एक्सीपिएंट्स का गुणात्मक विवरण भी शामिल होगा। यह नया प्रावधान 1 मार्च 2026 से लागू होगा।
सरल शब्दों में कहें तो अब दवा की पैकिंग पर दिए गए क्यूआर कोड को स्कैन करने पर मरीजों को यह जानकारी भी मिलेगी कि उस दवा में कौन-कौन से एक्सीपिएंट्स (यानी दवा को बनाने में इस्तेमाल किए गए सहायक तत्व) मिलाए गए हैं। यह बदलाव खासकर उन मरीजों के लिए बेहद उपयोगी होगा जिन्हें किसी खास एक्सीपिएंट से एलर्जी की समस्या होती है।
क्या हैं एक्सीपिएंट्स?
किसी भी दवा में सक्रिय तत्व यानी एक्टिव फार्मा इंग्रीडिएंट (API) के साथ-साथ कुछ अन्य रसायन या पदार्थ मिलाए जाते हैं। इन्हें ही एक्सीपिएंट्स कहा जाता है। इनका काम दवा को स्थायित्व देना, उसका स्वाद या रंग बेहतर करना या उसे लंबे समय तक सुरक्षित रखना होता है। जैसे – पैराबेन को परिरक्षक (preservative) के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। लेकिन कई बार मरीजों को इनसे एलर्जी हो जाती है और यह दवा के दुष्प्रभाव का कारण बन सकती है।
क्यों उठाया गया यह कदम
पिछले कुछ समय से मरीजों और डॉक्टरों की तरफ से लगातार शिकायतें आ रही थीं कि बाजार में उपलब्ध दवाओं की स्ट्रिप्स पर एक्सीपिएंट्स का कोई उल्लेख नहीं होता। ऐसे में जिन मरीजों को पैराबेन या अन्य एक्सीपिएंट्स से एलर्जी है, उन्हें दवा चुनने में मुश्किल होती है। खासकर उच्च रक्तचाप जैसी बीमारियों में मरीजों को “पैराबेन-फ्री” दवाएं ढूंढने में परेशानी आती थी।
यही वजह रही कि इस मुद्दे पर स्वास्थ्य मंत्रालय के अंतर्गत आने वाली औषधि तकनीकी सलाहकार बोर्ड (DTAB) और दवा परामर्शदात्री समिति (DCC) की बैठकों में विस्तार से चर्चा हुई। पहले यह सुझाव आया था कि दवाओं की प्रत्येक स्ट्रिप पर एक्सीपिएंट्स का नाम छापा जाए। लेकिन दवा कंपनियों ने इसे तकनीकी रूप से मुश्किल बताया, क्योंकि स्ट्रिप पर जगह सीमित होती है और सारी जानकारी देना संभव नहीं होता। इसके बाद यह सहमति बनी कि यह विवरण क्यूआर कोड में जोड़ा जाए।
अधिसूचना में क्या कहा गया
स्वास्थ्य मंत्रालय ने अब अंतिम अधिसूचना जारी कर दी है, जिसे औषधि (द्वितीय संशोधन) नियम, 2025 कहा गया है। इसमें स्पष्ट किया गया है कि अनुसूची H2 में सूचीबद्ध सभी दवा निर्माण उत्पादों के निर्माता अपने पैकेजिंग लेबल पर क्यूआर कोड या बारकोड प्रिंट करेंगे। इस क्यूआर कोड को स्कैन करने पर मरीजों को अब तक मिलने वाली जानकारी जैसे –
दवा का नाम
ब्रांड नाम
निर्माता का नाम और पता
बैच नंबर
निर्माण व समाप्ति तिथि
लाइसेंस नंबर
और अन्य विवरण
के साथ-साथ अब एक्सीपिएंट्स का गुणात्मक विवरण भी मिलेगा। यानी मरीज यह जान पाएंगे कि दवा में कौन-कौन से सहायक तत्व डाले गए हैं।
कब से लागू होगा नियम
यह नया नियम 1 मार्च 2026 से लागू होगा। फिलहाल दवा कंपनियों को तैयारी का समय दिया गया है ताकि वे अपनी उत्पादन और पैकेजिंग प्रणाली में बदलाव कर सकें।
विशेषज्ञों की राय
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम रोगियों की सुरक्षा के लिहाज से बेहद अहम है। इससे दवा उद्योग में पारदर्शिता बढ़ेगी और मरीज ज्यादा सुरक्षित दवाओं का चुनाव कर सकेंगे।
दिल्ली के एक वरिष्ठ फार्माकोलॉजिस्ट ने कहा – “कई बार मरीजों को दवा खाने के बाद एलर्जी हो जाती है, लेकिन उन्हें पता ही नहीं चलता कि वजह क्या है। जब एक्सीपिएंट्स की जानकारी क्यूआर कोड में उपलब्ध होगी तो डॉक्टर आसानी से यह पहचान पाएंगे कि कौन-सा तत्व एलर्जी का कारण बना।”
उद्योग जगत की चुनौतियाँ
दवा उद्योग से जुड़े विशेषज्ञ मानते हैं कि यह कदम सही दिशा में है, लेकिन इसके लिए कंपनियों को अपने पैकेजिंग सिस्टम को अपग्रेड करना होगा। हर दवा के लिए अलग-अलग क्यूआर कोड जनरेट करना और उसमें विस्तृत डेटा शामिल करना आसान नहीं होगा। हालांकि, लंबी अवधि में यह बदलाव दवा उद्योग के लिए भी फायदेमंद साबित होगा क्योंकि इससे मरीजों का भरोसा बढ़ेगा।
पहले भी हुई थी पहल
गौरतलब है कि इससे पहले 17 नवंबर 2022 की अधिसूचना के तहत देश के शीर्ष 300 ब्रांडों पर क्यूआर कोड लगाना अनिवार्य किया गया था। उस समय यह कदम नकली दवाओं पर रोक लगाने और दवा की असली पहचान सुनिश्चित करने के लिए उठाया गया था। अब उसी कड़ी को आगे बढ़ाते हुए मंत्रालय ने दवा की संरचना से जुड़ी संवेदनशील जानकारी भी जोड़ने का निर्णय लिया है।
आम जनता को मिलेगा लाभ
नई व्यवस्था से सबसे बड़ा फायदा आम जनता को मिलेगा। अब मरीज को सिर्फ दवा का नाम ही नहीं बल्कि उसकी पूरी संरचना की जानकारी मिल सकेगी। इससे –
एलर्जी वाले मरीज सुरक्षित दवा चुन सकेंगे।
डॉक्टर सही विकल्प सुझा पाएंगे।
दवा कंपनियों की पारदर्शिता बढ़ेगी।
और नकली या घटिया दवाओं की पहचान भी आसान होगी।
केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय का यह निर्णय दवा उद्योग और मरीजों दोनों के लिए दूरगामी असर डालने वाला है। यह कदम न सिर्फ मरीजों को दवा के प्रति जागरूक बनाएगा बल्कि दवा कंपनियों को भी ज्यादा जिम्मेदार बनाएगा।
आने वाले समय में जब कोई मरीज दवा की स्ट्रिप खरीदेगा और उसका क्यूआर कोड स्कैन करेगा तो उसे सिर्फ दवा का नाम ही नहीं बल्कि उसकी पूरी संरचना, निर्माण प्रक्रिया और एक्सीपिएंट्स की जानकारी भी मिलेगी। यह बदलाव भारतीय औषधि उद्योग को ज्यादा पारदर्शी, सुरक्षित और भरोसेमंद बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम साबित होगा