संशोधित अनुसूची-एम की समयसीमा पर पीडीएमए को राहत की उम्मीद, स्वास्थ्य मंत्रालय से करेगा सीधा संपर्क
नई दिल्ली। संशोधित अनुसूची-एम (Schedule-M) के कार्यान्वयन की समयसीमा को लेकर पंजाब ड्रग मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन (PDMA) को बड़ी राहत की उम्मीद जगी है। पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय में दायर याचिका की सुनवाई के दौरान एसोसिएशन को केंद्र सरकार से अभ्यावेदन देने का अवसर मिला है। अब पीडीएमए स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय से सीधे संपर्क कर समयसीमा बढ़ाने की मांग करेगा।
पीडीएमए ने तर्क दिया है कि सूक्ष्म और लघु फार्मा इकाइयों को 250 करोड़ रुपये तक के कारोबार वाली मध्यम इकाइयों के बराबर नहीं रखा जा सकता, क्योंकि उनकी आर्थिक और तकनीकी क्षमता सीमित है। एसोसिएशन ने संशोधित अनुसूची-एम मानकों के अनुपालन के लिए 31 दिसंबर 2028 तक समयसीमा बढ़ाने की मांग की है।
हाईकोर्ट में क्या हुआ
याचिका की सुनवाई न्यायमूर्ति हरसिमरन सिंह सेठी और न्यायमूर्ति विकास सूरी की खंडपीठ के समक्ष हुई। पीडीएमए ने अदालत को बताया कि वह इस मामले में केंद्र सरकार को औपचारिक अभ्यावेदन सौंपेगा और जब तक उस पर निर्णय नहीं हो जाता, तब तक कोई दंडात्मक कार्रवाई न की जाए।
केंद्र सरकार की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता ने अदालत को आश्वस्त किया कि यदि एसोसिएशन का अभ्यावेदन प्राप्त होता है, तो संबंधित अधिकारी आठ सप्ताह के भीतर उस पर निर्णय लेंगे। दावा व्यवहारिक पाए जाने पर राहत दी जाएगी, अन्यथा अस्वीकार करने के कारण स्पष्ट रूप से आदेश में दर्ज किए जाएंगे।
इसके बाद पीडीएमए ने याचिका पर जोर न देने पर सहमति जताई, जिस पर न्यायालय ने तदनुसार आदेश पारित कर दिया।
एमएसएमई वर्गीकरण बना बड़ा मुद्दा
पीडीएमए ने अपनी याचिका में बताया कि संशोधित एमएसएमई वर्गीकरण (2025) के अनुसार—
- सूक्ष्म उद्यम: 2.5 करोड़ रुपये तक निवेश, 2 करोड़ रुपये तक कारोबार
- लघु उद्यम: 25 करोड़ रुपये तक निवेश, 100 करोड़ रुपये तक कारोबार
- मध्यम उद्यम: 125 करोड़ रुपये तक निवेश, 250 करोड़ रुपये तक कारोबार
एसोसिएशन का आरोप है कि 250 करोड़ रुपये तक के कारोबार वाली इकाइयों के लिए तय समयसीमा बनाते समय सूक्ष्म और लघु इकाइयों की वास्तविक स्थिति को पूरी तरह नजरअंदाज किया गया।
पंजाब में हालात चिंताजनक
पीडीएमए के अनुसार पंजाब में लगभग 130 फार्मा इकाइयों में से केवल 30 इकाइयों ने ही संशोधित दिशानिर्देशों के अनुरूप अनुपालन प्रक्रिया शुरू की है। इनमें से कई दशकों पुरानी इकाइयां अभी 50% अनुपालन तक भी नहीं पहुंच पाई हैं।
देशभर में भी स्थिति कुछ अलग नहीं है। फरवरी 2025 की अधिसूचना के बाद 8,000 फार्मा एमएसएमई में से सिर्फ 1,200 इकाइयों ने ही गैप एनालिसिस दाखिल किया।
गैप एनालिसिस पर आपत्ति
पीडीएमए का कहना है कि गैप एनालिसिस प्रारूप में शर्तें इस तरह रखी गई थीं कि उन्हें स्वीकार करने के बाद बदलाव की कोई गुंजाइश नहीं बचती थी। इसके साथ ही यूनिटों को 31 दिसंबर 2025 तक अपग्रेड करने की बाध्यता थी।
एसोसिएशन का दावा है कि मौजूदा समयसीमा लागू रहने पर पंजाब की लगभग 120 में से 100 फार्मा यूनिटें बंद हो सकती हैं, जिससे दवा आपूर्ति और रोजगार दोनों पर गंभीर असर पड़ेगा।
ONDLS और कानूनी आपत्तियां
पीडीएमए ने आरोप लगाया कि गैप एनालिसिस के माध्यम से इकाइयों को ऑनलाइन ड्रग लाइसेंसिंग सिस्टम (ONDLS) स्वीकार करने के लिए बाध्य किया गया, जो राज्यों से लाइसेंसिंग अधिकार छीनकर केंद्रीकरण की ओर ले जाता है। एसोसिएशन का कहना है कि ड्रग्स एक्ट में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है, जिससे केंद्र सरकार उद्योग से इस तरह का डेटा मांग सके।
मंत्रालय को जल्द सौंपा जाएगा अभ्यावेदन
पीडीएमए अध्यक्ष जगदीप सिंह ने कहा कि एसोसिएशन ने अपना अभ्यावेदन तैयार कर लिया है और इसे जल्द ही स्वास्थ्य मंत्रालय को सौंप दिया जाएगा। उन्होंने उम्मीद जताई कि सरकार उद्योग और जनहित दोनों को ध्यान में रखते हुए व्यावहारिक समाधान निकालेगी।



