दवाओं की गुणवत्ता पर बड़ा खुलासा: 215 दवाएं फेल, कई राज्यों ने नहीं दी रिपोर्ट
देश में दवाओं की गुणवत्ता को लेकर एक चौंकाने वाली तस्वीर सामने आई है। Central Drugs Standard Control Organization (सीडीएससीओ) की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक जनवरी महीने में कुल 215 दवा नमूने ‘गैर-मानक गुणवत्ता’ (NSQ) पाए गए। यानी ये दवाएं तय मानकों पर खरी नहीं उतरीं। इससे सबसे बड़ा सवाल उठता है — क्या मरीजों तक पहुंच रही हर दवा सुरक्षित है?
सबसे ज्यादा मामले किन राज्यों से?
रिपोर्ट के अनुसार इस बार सबसे ज्यादा गैर-मानक दवाएं तमिलनाडु, कर्नाटक और राजस्थान से सामने आईं।
- तमिलनाडु में 43 दवाएं फेल पाई गईं।
- कर्नाटक में 31 दवाएं फेल हुईं।
- राजस्थान में 25 नमूने गुणवत्ता परीक्षण में असफल रहे।
इसके अलावा तेलंगाना, केरल, ओडिशा, हिमाचल प्रदेश और जम्मू-कश्मीर से भी कई दवाएं फेल होने की खबर है।
इसका एक मतलब यह भी हो सकता है कि इन राज्यों में जांच ज्यादा सख्ती से की गई। लेकिन यह भी संभव है कि वहां निर्माण या सप्लाई में लापरवाही हुई हो।
लेकिन बड़ा झटका यहां है…
सीडीएससीओ की रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि 16 राज्यों और 7 केंद्र शासित प्रदेशों ने जनवरी महीने का एनएसक्यू डेटा ही जमा नहीं किया।
इन राज्यों में उत्तर प्रदेश, , गुजरात, मध्य प्रदेश, पंजाब, असम, छत्तीसगढ़ समेत कई बड़े राज्य शामिल हैं।
अब सवाल उठता है —
क्या वहां दवाओं की जांच नहीं हुई?
या जांच हुई लेकिन रिपोर्ट नहीं भेजी गई?
या फिर व्यवस्था में ही गंभीर खामी है?
जब बात लोगों की सेहत की हो, तब डेटा न भेजना अपने आप में गंभीर चिंता का विषय है।
नामी कंपनियों की दवाएं भी फेल
रिपोर्ट में कुछ बड़ी कंपनियों के उत्पाद भी फेल पाए गए। इनमें शामिल हैं:
- Torrent Pharmaceuticals Limited की एक टैबलेट
- Dr. Reddy’s Laboratories Limited की खांसी की सिरप का एक नमूना
- Hindustan Antibiotics Limited की एल्बेंडाजोल टैबलेट
- Karnataka Antibiotics and Pharmaceuticals Limited की एंटीबायोटिक दवा
यानी सरकारी और निजी — दोनों सेक्टर की कंपनियों की दवाएं गुणवत्ता जांच में फेल हुईं।
इसके अलावा कुछ इंजेक्शन, आईवी कैनुला और एंटीबायोटिक इंजेक्शन भी मानकों पर खरे नहीं उतरे। यह मामला और भी गंभीर हो जाता है क्योंकि इंजेक्शन और एंटीबायोटिक सीधे गंभीर मरीजों को दिए जाते हैं।
नकली दवाओं का भी खुलासा
जनवरी में कुछ दवाओं को “कथित तौर पर नकली” भी पाया गया। इनमें एंटीबायोटिक और दर्द निवारक दवाएं शामिल हैं।
सीडीएससीओ के अनुसार जिन बैच नंबर वाली दवाओं को नकली बताया गया, उनके असली निर्माताओं ने साफ कहा कि वह बैच उन्होंने बनाया ही नहीं।
मतलब बाजार में किसी ने उनके नाम का इस्तेमाल करके नकली दवा बेचने की कोशिश की।
यह सीधा-सीधा जनता की जान से खिलवाड़ है।
क्या बढ़ रहा है खतरा?
अगर पिछले महीने यानी दिसंबर 2025 से तुलना करें तो उस समय 167 नमूने फेल पाए गए थे। जनवरी में यह संख्या बढ़कर 215 हो गई।
यानी सिर्फ एक महीने में 48 दवाओं की बढ़ोतरी।
यह दो बातों की ओर इशारा कर सकता है:
- या तो जांच सख्त हुई है
- या दवाओं की गुणवत्ता में गिरावट आई है
दोनों ही स्थितियां चिंता पैदा करती हैं।
सीडीएससीओ का क्या कहना है?
सीडीएससीओ ने सफाई दी है कि जब किसी दवा को एनएसक्यू घोषित किया जाता है तो वह सिर्फ उसी खास बैच के लिए होता है। इसका मतलब यह नहीं कि उसी कंपनी की बाकी सारी दवाएं खराब हैं।
लेकिन आम जनता के लिए यह फर्क समझना आसान नहीं होता। जब खबर आती है कि कोई दवा फेल हो गई, तो भरोसा डगमगाना स्वाभाविक है।
असली चिंता क्या है?
सबसे बड़ी चिंता यह है कि कई राज्यों ने रिपोर्ट ही नहीं भेजी।
अगर जांच नहीं हो रही तो यह गंभीर लापरवाही है।
अगर जांच हुई लेकिन रिपोर्ट नहीं भेजी गई तो यह प्रशासनिक कमजोरी है।
और अगर रिपोर्टिंग सिस्टम ही कमजोर है तो उसे तुरंत सुधारने की जरूरत है।
दवा कोई सामान्य उत्पाद नहीं है। यह सीधे इंसान की जिंदगी से जुड़ा मामला है।
आगे क्या होना चाहिए?
- हर राज्य में नियमित और पारदर्शी जांच हो
- सभी राज्यों को समय पर डेटा भेजना अनिवार्य किया जाए
- नकली दवा बनाने वालों पर सख्त कानूनी कार्रवाई हो
- कंपनियों की निर्माण इकाइयों की अचानक जांच की जाए
- जनता को भी जागरूक किया जाए कि संदिग्ध दवा की शिकायत कहां करें
निष्कर्ष
जनवरी की रिपोर्ट ने साफ कर दिया है कि दवा गुणवत्ता की निगरानी को और मजबूत करने की जरूरत है।
215 दवाओं का फेल होना केवल एक आंकड़ा नहीं है — यह स्वास्थ्य व्यवस्था के लिए चेतावनी है।
जब दवा ही मानक पर खरी न उतरे तो इलाज पर भरोसा कैसे बनेगा?
अब वक्त है कि सरकार, राज्य औषधि विभाग और दवा कंपनियां मिलकर इस मुद्दे को गंभीरता से लें।
क्योंकि मामला सिर्फ नियमों का नहीं —
देश के करोड़ों लोगों की सेहत और जिंदगी का है।



