हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: दवा मामलों में पुलिस नहीं कर सकती FIR दर्ज, सिर्फ सक्षम अधिकारी को अधिकार
नई दिल्ली। दिल्ली उच्च न्यायालय ने दवा उद्योग और कानूनी जगत को हिला देने वाला अहम फैसला सुनाया है। अदालत ने साफ कर दिया कि औषधि एवं प्रसाधन सामग्री अधिनियम, 1940 (D&C Act) के तहत अपराधों में पुलिस सीधे एफआईआर दर्ज नहीं कर सकती। यह अधिकार केवल अधिनियम की धारा 32 के अंतर्गत नियुक्त सक्षम अधिकारी को ही है।
इस फैसले से न केवल दवा कंपनियों को बड़ी राहत मिली है, बल्कि अब पुलिस की सीधी दखलअंदाजी पर भी रोक लग गई है।
मामला क्या था?
यह विवाद उस समय उठा जब एक फार्मा कंपनी पर आरोप लगा कि उसने अस्पताल को खराब दवाइयाँ (डोसेटेक्सेल 20 मिलीग्राम इंजेक्शन) सप्लाई कीं। शिकायतकर्ता के मुताबिक, दवा की शीशियों में कांच के टुकड़े और बाहरी कण पाए गए, जो मरीजों की जिंदगी के लिए खतरा बन सकते थे।
शिकायत पर मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट (एमएम) ने सीआरपीसी की धारा 156(3) के तहत आदेश दिया और कंपनी, उसके पार्टनर्स और कर्मचारियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कर दी गई। एफआईआर आईपीसी की धारा 274, 275 और डी एंड सी एक्ट की धारा 13 में दर्ज हुई।
यही आदेश अब हाईकोर्ट में चुनौती दी गई थी।
हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी
न्यायमूर्ति नीना बंसल कृष्णा की बेंच ने कहा:
“पुलिस के पास डी एंड सी एक्ट के तहत अपराधों पर एफआईआर दर्ज करने का कोई अधिकार नहीं है। यह कार्य केवल सक्षम अधिकारी ही कर सकता है। इसलिए इस मामले में दर्ज की गई एफआईआर अधिकार क्षेत्र से बाहर थी और इसे रद्द किया जाता है।”
पीठ ने यह भी नाराजगी जताई कि एफआईआर 2019 में दर्ज हुई थी, लेकिन जांच आज तक पूरी नहीं हुई। अदालत ने कहा कि यह लापरवाही किसी भी तरह स्वीकार्य नहीं है।
पक्षकारों की दलीलें
- याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता आदित्य सिंह देशवाल ने दलील दी कि पुलिस की ओर से दर्ज की गई एफआईआर गैरकानूनी है, क्योंकि कानून इस शक्ति को केवल औषधि नियंत्रक या संबंधित सक्षम अधिकारी को देता है।
- राज्य की ओर से एपीपी उत्कर्ष ने शिकायतकर्ता का पक्ष रखा, लेकिन अदालत ने स्पष्ट कर दिया कि प्रक्रिया का पालन किए बिना पुलिस सीधे एफआईआर दर्ज नहीं कर सकती।
क्यों अहम है यह फैसला?
- दवा उद्योग पर सीधा असर – अब पुलिस सीधे दवा कंपनियों पर एफआईआर नहीं कर पाएगी, जिससे मनमानी और दबाव की गुंजाइश कम होगी।
- कानूनी प्रक्रिया मजबूत – शिकायत अब सिर्फ औषधि नियंत्रक या सक्षम अधिकारी के जरिए ही आगे बढ़ सकेगी।
- भविष्य के मुकदमों पर असर – कई लंबित केसों में यह फैसला नजीर साबित होगा।
मरीजों की सुरक्षा बनाम कंपनियों की जिम्मेदारी
यह फैसला दवा कंपनियों के लिए राहत भले ही हो, लेकिन मरीजों की सुरक्षा का सवाल भी बड़ा है। अदालत ने यह साफ किया कि यदि शिकायत वाजिब है, तो सक्षम अधिकारी की जिम्मेदारी होगी कि वह तत्काल कार्रवाई करे और दोषियों को बचने न दे।
दिल्ली हाईकोर्ट के इस आदेश ने यह स्पष्ट कर दिया है कि दवा उद्योग से जुड़े मामलों में कानूनी प्रक्रिया का पालन ही सर्वोपरि है। पुलिस अब सीधे एफआईआर दर्ज नहीं कर पाएगी, लेकिन इसका मतलब यह भी है कि शिकायतें अब और अधिक पारदर्शी एवं नियामक ढांचे के भीतर जांची जाएंगी।



