हल्द्वानी में बिल्डर फरार, अब खरीदारों को फ्लैट दिलाएगा बैंक
रेरा और अपीलेट ट्रिब्यूनल का बड़ा फैसला, पीएनबी की याचिका खारिज
देहरादून/हल्द्वानी। क्या बैंक सिर्फ अपना कर्ज वसूलने तक सीमित हैं या उनकी सामाजिक जिम्मेदारी भी तय होती है? हल्द्वानी के बहुचर्चित ग्रुप हाउसिंग मामले में यही सवाल अब बड़े फैसले के साथ सामने आया है। बिल्डर के 12 करोड़ रुपये से अधिक की रकम लेकर फरार होने के बाद अब खरीदारों को फ्लैट दिलाने की जिम्मेदारी बैंक पर आ गई है।
Punjab National Bank (पीएनबी) ने बिल्डर को दिया गया करीब 11 करोड़ रुपये का ऋण सुरक्षित करने के लिए बंधक जमीन की नीलामी की अनुमति मांगी थी। Uttarakhand Real Estate Regulatory Authority (रेरा) ने सशर्त नीलामी की अनुमति दी, लेकिन स्पष्ट किया कि खरीदारों के हितों की रक्षा पहले होगी। बैंक इस आदेश के खिलाफ RERA Appellate Tribunal पहुंचा, जहां उसकी याचिका खारिज कर दी गई। अब बैंक को शर्तों का पालन करना ही होगा।
12 करोड़ से ज्यादा की रकम लेकर फरार हुआ बिल्डर
हल्द्वानी के दमुवाडुंगा क्षेत्र में एक समूह आवासीय परियोजना शुरू की गई थी। बिल्डर धनंजय गिरि ने जमीन पीएनबी की हल्द्वानी शाखा में बंधक रखकर करीब 11 करोड़ रुपये का ऋण लिया। इसी बीच छह खरीदारों से आठ फ्लैट की बुकिंग कर करीब एक करोड़ से अधिक की रकम भी ली गई।
चौंकाने वाली बात यह रही कि परियोजना का निर्माण शुरू ही नहीं किया गया। बैंक का बकाया 10.74 करोड़ रुपये पहुंच गया और खरीदारों की रकम अलग फंसी रही। बाद में बिल्डर फरार हो गया। उसके खिलाफ कई एफआईआर दर्ज हुईं और गैर-जमानती वारंट भी जारी हुआ।
रेरा की सख्त टिप्पणी: नीलामी में बैंक बनता है प्रमोटर
मामला जब रेरा पहुंचा तो अध्यक्ष अमिताभ मैत्रा ने नीलामी प्रक्रिया पर अस्थायी रोक लगा दी। अंतिम सुनवाई में रेरा ने साफ कहा कि—
- बैंक ने जिस जमीन को बंधक रखा, उससे पहले फ्लैटों की बिक्री हो चुकी थी
- खरीदारों के हितों की अनदेखी नहीं की जा सकती
- जब बैंक गिरवी संपत्ति की नीलामी करता है, तो वह प्रमोटर की स्थिति में आ जाता है
रेरा ने राजस्थान हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का हवाला देते हुए कहा कि खरीदारों को संरक्षण देना अनिवार्य है।
सशर्त नीलामी की अनुमति, खरीदारों को प्राथमिकता
रेरा ने नीलामी की अनुमति देते हुए स्पष्ट निर्देश दिए—
- नीलामी विज्ञापन में यह स्पष्ट करना होगा कि आठ फ्लैट पहले ही बेचे जा चुके हैं।
- सफल बोलीदाता परियोजना पूरी करने और सभी खरीदारों को फ्लैट देने के लिए बाध्य होगा।
- 36 माह के भीतर फ्लैट देना अनिवार्य होगा।
- देरी होने पर 10.9% की दर से ब्याज देना होगा।
- यदि नीलामी में अतिरिक्त धनराशि मिलती है तो वह बिल्डर को नहीं, बल्कि खरीदारों को ब्याज के रूप में दी जाएगी।
बैंक की अपील खारिज, सामाजिक जिम्मेदारी पर जोर
पीएनबी ने इन शर्तों को चुनौती देते हुए रेरा अपीलेट ट्रिब्यूनल का दरवाजा खटखटाया। बैंक का तर्क था कि उसकी भूमिका केवल ऋण वसूली तक सीमित है।
लेकिन ट्रिब्यूनल ने साफ कर दिया कि बैंक की सामाजिक जिम्मेदारी भी है। यदि बैंक नीलामी कर रहा है तो उसे परियोजना पूरी कराने और खरीदारों को राहत दिलाने की जिम्मेदारी निभानी होगी।
यह फैसला न सिर्फ हल्द्वानी बल्कि पूरे उत्तराखंड में रियल एस्टेट सेक्टर के लिए एक बड़ा संदेश है।
इन खरीदारों को अब राहत की उम्मीद
- हरीश चंद्र पांडे (अप्रैल 2017)
- पाइन ट्री वेंचर (जतिन मिनोचा) (मई 2018)
- डा. जीएल फिर्मल (नवंबर 2017)
- बीएल फिर्मल (अक्टूबर 2017)
- जुगल किशोर तिवारी (अक्टूबर 2017)
- गुरमीत सिंह (नवंबर 2019) – तीन फ्लैट
इन सभी ने वर्षों पहले अपनी जमा-पूंजी लगाई थी, लेकिन परियोजना अधूरी ही रही। अब ट्रिब्यूनल के आदेश के बाद उन्हें फ्लैट मिलने की उम्मीद जगी है।
बड़ा संदेश: खरीदारों के अधिकार सर्वोपरि
यह मामला सिर्फ एक परियोजना का नहीं, बल्कि रियल एस्टेट व्यवस्था में जवाबदेही का है।
- बिल्डर फरार
- बैंक वसूली की तैयारी में
- खरीदार बीच में फंसे
लेकिन अब स्पष्ट हो गया है कि खरीदारों के हितों की रक्षा सर्वोपरि है। बैंक अगर नीलामी करेगा तो उसे परियोजना भी पूरी करानी होगी।
हल्द्वानी का यह फैसला आने वाले समय में कई अन्य मामलों की दिशा तय कर सकता है। खरीदारों के लिए यह राहत की खबर है, तो बैंकों और बिल्डरों के लिए चेतावनी भी।



