अनुसूची-एम पर उद्योग का अलार्म: दवा निर्माताओं ने मांगा दिसंबर 2026 तक समय, LUB ने सरकार पर दबाव तेज किया
नई दिल्ली संशोधित अनुसूची-एम (Schedule-M) को लेकर दवा उद्योग में बेचैनी अब खुलकर सामने आ गई है। लघु उद्योग भारती (LUB) ने फार्मास्युटिकल सेक्टर से सीधा फीडबैक मांगते हुए स्वास्थ्य मंत्रालय से दिसंबर 2026 तक समय-सीमा बढ़ाने की तैयारी तेज कर दी है। संगठन का कहना है कि मौजूदा हालात में छोटे और मध्यम दवा निर्माता इस कड़े मानक को समय पर लागू करने की स्थिति में नहीं हैं।
LUB ने इसके लिए डिजिटल गूगल फॉर्म जारी किया है, जिसमें दवा निर्माताओं से अनुपालन, बुनियादी ढांचे, मशीनरी, दस्तावेज़ीकरण और प्रशिक्षण से जुड़ी जमीनी समस्याओं पर विस्तृत और तथ्यात्मक सुझाव मांगे गए हैं। इन सुझावों के आधार पर स्वास्थ्य मंत्रालय के समक्ष ठोस प्रस्तुति रखी जाएगी।
मशीनरी, मैनपावर और ट्रेनिंग सबसे बड़ी बाधा
LUB के वरिष्ठ पदाधिकारी डॉ. राजेश गुप्ता ने स्पष्ट किया कि उद्योग को एक साथ कई गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है।
उन्होंने बताया कि:
- मशीनरी और उपकरणों की आपूर्ति में भारी देरी
- सत्यापन और एसओपी अनुपालन की जटिल प्रक्रियाएं
- कुशल तकनीकी कार्यबल की भारी कमी
- 30 घंटे के अनिवार्य प्रशिक्षण कोर्स की व्यवस्था
- संशोधित RPTUAS योजना को लेकर अनिश्चितता
जैसी समस्याओं के कारण अनुसूची-एम का समय पर पालन व्यवहारिक रूप से संभव नहीं है।
डॉ. गुप्ता के अनुसार, 10 और 16 जनवरी 2026 को हुई उच्चस्तरीय बैठकों के बाद केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री ने LUB के प्रतिनिधिमंडल को दोबारा बुलाने का संकेत दिया है, लेकिन इस बार ठोस आंकड़ों और जमीनी रिपोर्ट के साथ।
फॉर्म केवल वास्तविक जरूरतमंद भरें
LUB ने साफ किया है कि यह फॉर्म केवल उन्हीं निर्माताओं द्वारा भरा जाए जो वास्तविक रूप से दिसंबर 2026 तक समय चाहते हैं और निर्धारित शर्तों के अनुरूप अपग्रेडेशन के इच्छुक हैं।
फॉर्म में कंपनी का नाम, स्थान, राज्य, प्रमोटर विवरण, संपर्क जानकारी, CDSCO/राज्य FDA द्वारा बताए गए गैप एनालिसिस और विस्तार का कारण दर्ज करना अनिवार्य किया गया है।
IDMA भी सरकार से समय बढ़ाने के पक्ष में
इस मुद्दे पर इंडियन ड्रग मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन (IDMA) भी खुलकर सामने आ गई है।
IDMA की राष्ट्रीय प्रवक्ता डॉ. विरांची शाह ने बताया कि संगठन ने सरकार को ज्ञापन सौंपकर:
- अनुसूची-एम में सरलीकरण
- स्पष्टीकरण
- अपग्रेडेशन प्रक्रिया शुरू कर चुके MSMEs को अतिरिक्त समय
देने की मांग की है।
उन्होंने कहा कि IDMA पिछले दो वर्षों से CDSCO और राज्य लाइसेंसिंग प्राधिकरणों के साथ मिलकर MSMEs को तकनीकी और प्रशिक्षण सहयोग दे रहा है, साथ ही RPTUAS जैसी वित्तीय सहायता योजनाओं को मजबूत करने में भी सक्रिय भूमिका निभा रहा है।
दवा सप्लाई और नौकरियों पर खतरा
उद्योग सूत्रों की मानें तो यदि समय सीमा में राहत नहीं मिली, तो इसके गंभीर परिणाम सामने आ सकते हैं।
सख्त डेडलाइन के कारण:
- आम इस्तेमाल की दवाओं की भारी कमी
- हजारों कर्मचारियों की नौकरियां खतरे में
- भारत पर निर्भर निम्न व मध्यम आय वाले देशों की दवा आपूर्ति प्रभावित
हो सकती है।
अब तक क्या है स्थिति
- ₹250 करोड़ से अधिक टर्नओवर वाले निर्माताओं पर 1 जुलाई 2024 से लागू
- MSMEs के लिए पहले 1 जनवरी 2025
- बाद में बढ़ाकर 31 दिसंबर 2025
- अब उद्योग की मांग: दिसंबर 2026 तक विस्तार
नज़र अब स्वास्थ्य मंत्रालय पर
अब सभी की निगाहें केंद्र सरकार और स्वास्थ्य मंत्रालय के फैसले पर टिकी हैं। सवाल साफ है—
क्या सरकार उद्योग की जमीनी सच्चाइयों को समझेगी, या सख्त नियमों की कीमत दवा उपलब्धता और रोजगार को चुकानी पड़ेगी?



