‘दवा’ नहीं, खतरा! उत्तराखंड में बनी 40 दवाएं फेल, हरिद्वार की 32 दवाओं ने बढ़ाई मरीजों की चिंता
देहरादून। उत्तराखंड की फार्मास्यूटिकल इंडस्ट्री से जुड़ी एक बेहद गंभीर और चौंकाने वाली रिपोर्ट सामने आई है, जिसने दवा गुणवत्ता व्यवस्था पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन (CDSCO) और राज्य औषधि नियंत्रण विभाग द्वारा देशभर में की जा रही नियमित सैंपलिंग के दौरान उत्तराखंड में निर्मित कुल 40 दवाइयों के सैंपल गुणवत्ता परीक्षण में फेल पाए गए हैं। ये दवाएं निर्धारित औषधीय मानकों पर खरी नहीं उतरीं, जिससे मरीजों की सुरक्षा को लेकर गहरी चिंता पैदा हो गई है।
हरिद्वार बना ‘हॉटस्पॉट’, 32 दवाएं फेल
जांच रिपोर्ट के अनुसार सबसे अधिक मामले हरिद्वार जिले से सामने आए हैं, जहां निर्मित 32 दवाइयों के सैंपल फेल घोषित किए गए। इसके अलावा
देहरादून जिले की 3 दवाएं,
उधम सिंह नगर जिले की 5 दवाएं
भी गुणवत्ता जांच में असफल रहीं।
विशेषज्ञों का कहना है कि इतनी बड़ी संख्या में फेल सैंपल यह संकेत देते हैं कि दवा निर्माण प्रक्रिया में कहीं न कहीं गंभीर लापरवाही हो रही है।
फेल दवा का मतलब—इलाज नहीं, जोखिम
दवा विशेषज्ञों के अनुसार जब कोई दवा सैंपल फेल होता है, तो इसका सीधा अर्थ है कि वह दवा सही ताकत (Potency) नहीं रखती,
शुद्धता (Purity) में कमी है,
या फिर सुरक्षा मानकों पर खरी नहीं उतरती।
ऐसी दवाएं मरीज की बीमारी ठीक करने के बजाय उसे और बीमार कर सकती हैं, और गंभीर मामलों में जान का खतरा भी पैदा कर सकती हैं।
लगातार फेल हो रहे सैंपल, सिस्टम पर सवाल
यह पहला मौका नहीं है जब उत्तराखंड की दवाओं पर सवाल उठे हों। बीते कुछ समय से लगातार दवाइयों के सैंपल फेल होने की खबरें सामने आ रही हैं। इससे यह आशंका गहराती जा रही है कि निरीक्षण व्यवस्था कमजोर है,
गुणवत्ता नियंत्रण प्रक्रियाएं कागज़ों तक सीमित हैं,
और नियमों की सख्ती जमीन पर दिखाई नहीं दे रही।
देशभर में सप्लाई, खतरा भी देशव्यापी
उत्तराखंड देश के प्रमुख फार्मा मैन्युफैक्चरिंग हब्स में शामिल है। यहां बनी दवाइयां देश के कई राज्यों में सप्लाई होती हैं। ऐसे में घटिया गुणवत्ता की दवाओं का बाजार में पहुंचना सिर्फ उत्तराखंड ही नहीं, बल्कि पूरे देश के मरीजों के लिए बड़ा खतरा बन सकता है।
कार्रवाई की तैयारी, नोटिस और रिकॉल संभव
सूत्रों के अनुसार, फेल पाए गए सैंपलों से जुड़ी दवा कंपनियों को कारण बताओ नोटिस जारी किए जाने की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। साथ ही
दोषी बैचों को बाजार से वापस मंगाने (रिकॉल),
लाइसेंस निलंबन,
और कानूनी कार्रवाई
जैसे सख्त कदम उठाए जा सकते हैं।
सबसे बड़ा सवाल
अब सवाल यह है कि
क्या मरीजों की सेहत से हुए इस खिलवाड़ पर कड़ी कार्रवाई होगी?
या फिर
जांच फाइलों में दबकर रह जाएगी?
फिलहाल मामला जांच के दायरे में है, लेकिन यह खुलासा उत्तराखंड की दवा उद्योग व्यवस्था के लिए एक गंभीर चेतावनी बनकर सामने आया है।



